भारतीयता का वध मत करो

भारतीयता का वध मत करो

इस सम्पादकीय को लिखना मेरे लिए कठिन हैं, क्योंकि मैं उस विषय पर लिखने जा रहा हूं, जो मेरे हृदय के काफी निकट है। यह बिलकुल संभव है कि सभी भारतवासी मेरी जैसी धारणा न रखते हों, लेकिन मुझे पूरा विश्वास है कि हाल ही में केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय द्वारा बाजार से खरीद-फरोक्चत किये जाने वाले निर्दोष पशुओं के वध पर प्रतिबन्ध लगाने वाले आठ पेजों के कानून से अधिकतर लोग सहमत होंगे। यह मातृभूमि हजारों वर्ष पुरानी बहुमूल्य संस्कृति के लिए विख्यात है, जो केवल गोमाता ही नहीं बल्कि सभी प्रकार के जीवों के प्रति अपनी दया की भावना को दर्शाता है। गोमाता आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और धार्मिक रूप से हम सभी भारतीयों के जीवन से जुड़ी हुई है। भारत में कई मुस्लिम डेरी फार्म के जरिये गोपालन करते हैं, जहां वे अच्छी-खासी संख्या में देशी नस्ल की गायों को रखते हैं। दूध हम सभी के शारीरिक विकास के लिए आवश्यक है। गोमाता कभी नहीं कहती कि दूध केवल हिन्दुओं के लिए होता है। जब हम जन्म लेते हैं तो हमारा शारीरिक विकास मां के दूध से होता है और बड़े होने पर हम पूरी तरह से गोमाता के ऊपर निर्भर हो जाते हैं। यही कारण है कि इस भारतभूमि पर मां और गोमाता को एक जैसा सम्मान दिया जाता है। इसी क्रम में हमारे कुछ बुद्धिजीवी अर्थशास्त्रियों का कहना है कि बूढ़े हो रहेे पशुओं को कौन खिलायेगा? चूंकि इनकी संख्या काफी अधिक है ऐसे में इनको कहां रखा जायेगा? भारत समूचे विश्व में सबसे अधिक बीफ का निर्यात करता है, ऐसे में इन बीफ कारखानों का क्या होगा? इन कारखानों में काम करने वाले लोगों को कौन नौकरी देगा? इससे पता चलता है कि लोग अब मानवता को छोड़ते हुए आधुनिकता के चरम पर पहुंच चुके है। इन बुद्धिजीवी अर्थशास्त्रियों, सेक्युलर पत्रकारों और नेताओं की इस सोच के लिए मैं इनको जिम्मेदार नहीं ठहराऊंगा। इस भौतिकवादी संसार में पैसे को काफी तवज्जो दिया जाता है और आजादी के बाद भौतिकवाद के आधार पर लिखी गई किताबों को ही हमारे बुद्धिजीवी पढ़ते-पढ़ाते आ रहे हंै जो हमारी भारतीय संस्कृति से कोई मेल-मिलाप नहीं रखती। ये वही आधुनिक बुद्धिजीवी और सेक्युलर लोग हैं जो अपने माता-पिता को अपने से दूर फाइव-स्टार वृद्धाश्रम में भेज देते हैं और अपने बच्चों को बताते हैं कि उनके दादा-दादी पागल हो चुके हंै। हम सभी भारतीय सदियों से  ‘वसुधैव कुटुम्बकम’को मानते आ रहे हैं। अत: अपने दिल को बड़ा करते हुए इन मुर्ख बुद्धिजीवियों और अर्थशास्त्रियों को माफ कर देना चाहिए जो पशुवध के लिए जानवरों की खरीद-फरोक्चत पर लगे  प्रतिबन्ध का विरोध कर रहे हैं।  अपने  देश को मां (भारतमाता), गाय को गोमाता, नदियों को देवी, सूर्य और जंगलों को भगवान के रूप में मानते हुए हम अपनी इस भारत भूमि की पूजा करते हैं। इसलिए इन तथाकथित सेक्युलर भाइयों से यही विनती है कि वे हमारी देवी-देवताओं, इस देश की संस्कृति और लोगों की धार्मिक आस्था की अवमानना न करें। साथ ही साथ पूरा भारत इनको चेतावनी देता है कि ये मुर्ख बुद्धिजीवी भारत और भारतीयता के विरुद्ध षडयंत्र करना बंद करें। गोवंश की हत्या कर पैसा इक्कठा करना हमारी संस्कृति नहीं है। फिर भी यदि कोई यह तर्क देता है कि इस अमानवीय कृत्य के ऊपर एक बड़ा  उद्योग टिका है तो भगवान ही उनका भला करें। क्या आप मुझे बता सकते हैं कि भारत में कितने लोग पशुओं की निर्मम हत्या कर सकते है? कितने लोग उससे निकलने वाली लहू की धार का सामना करते हुए इन पशुओं के मांस को अपने भोजन के रूप में ग्रहण कर सकते है?  यह केवल दानवों के द्वारा ही किया जा सकता है जैसा की केरल में कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने इस पूजनीय धरती पर किया। कोई भी व्यक्ति पैसा कमाने और अपने मुंह के स्वाद के लिए इतना नीचे कैसे गिर सकता है?

यदि हम अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करना चाहते है तो ऐसे हजारों रास्ते हो सकते है जिनके बारे में हमारे  वैज्ञानिक, अर्थशास्त्री और सरकार सोच सकती है। चूंकि भारत में दुबारा दुग्ध क्रांति लाने की आवश्यकता है, हमारे दूरदर्शी प्रधानमंत्री यदि चाहें तो नीति आयोग के अंतर्गत एक कमिटी की संरचना कर सकते हंै जो इस क्षेत्र से जुड़े लोगों को रोजगार मुहैया करा सके। एक समय था जब भारत में चालीस प्रकार की देशी नस्ल की गायें होती थी।  लेकिन आज इनमें से अस्सी प्रतिशत देशी नस्ल की गायें विलुप्त होने के कगार पर हैं। विश्व के सभी विकसित देश अब ए2 दूध का प्रयोग करते है जो केवल भारतीय नस्ल की गायों से ही निकलता है। ब्राजील और अमेरिका जैसे कई बड़े देश अब भारतीय नस्ल की गायों के भ्रूण का आयात कर उसे अपनी ब्रीड की गायों में इस्तेमाल करना शुरू कर चुके हैं, यह जानते हुए भी कि उनकी नस्ल की गायें अधिक मात्रा में दूध देती हैं। देखा जाए तो हाइब्रिड गाय का दूध शुद्ध नही होता व संक्रमित होता है, लेकिन भारत में इस दूध को सर्वाधिक ग्रहण किया जाता है। अत: सरकार को देशी नस्ल की गायों की संख्या बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए।

क्या कोई बुद्धिजीवी अर्थशास्त्री यह सिद्ध कर सकता है कि पशुधन पर आधारित अर्थव्यवस्था बीफ के व्यापार से कम लाभदायक होती है? भारत की अस्सी प्रतिशत अर्थव्यवस्था कृषि-आधारित है और गोवंश उसमें सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। केमिकल फर्टिलाईजर के अत्यधिक प्रयोग से आज देश के कई हिस्सो में भूमि की उर्वरक क्षमता खत्म होती जा रही है, अत: यह उचित समय है कि हम बायो-नेचुरल गैस और गोबर तथा सड़ी सब्जियों और घरों से निकलने वाले कचरे से बनी आर्गेनिक खाद का उत्पादन करें। यह ध्यान देने योग्य बात है कि देश की कुल मांग का पांच प्रतिशत ही हरित ऊर्जा का हम उत्पादन क र पाते हैं। कम शब्दों में कहें तो जब हमें रास्ते मिलते  हैं तो साथ ही हमे कई विचार भी मिलते हैं और इसके लिए भारत में अपार संभावनाएं हैं। यदि किसी जीव की हत्या किसी व्यापार को बचाने के लिए की जाती है तो यह कोई तर्क नहीं है। साथ ही यह कहना भी गलत होगा कि बूढ़े हो रहे गोवंश के लिए किसी तरह के आश्रय-स्थल की व्यवस्था मुमकिन नहीं। यूज-एण्ड-थ्रो एवं हायर-एण्ड-फायर जैसी नीतियां हमारी संस्कृति का हिस्सा नही हैं। हम अमेरिका जैसे देश नहीं है जो अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए कुछ भी करने को तैयार हो। इस परिप्रेक्ष्य में यह कहना अतिश्योक्ति नही होगी कि वह दिन दूर नहीं जब हम देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए देश में 24 घंटे शराब की दुकानें खुली रहेंगी और वेश्यावृति को भी वैधता मिल जाए। एक बार इंदिरा गांधी ने मतदाताओं से निवेदन किया था कि वे  सबकुछ भूलकर गाय के लिए वोट करें। स्वयं गांधीजी भारत में गोवध पर प्रतिबन्ध के सबसे बड़े समर्थक थे। अत: भारत को विश्वगुरु बनाने के लिए हम सभी को अपनी सोच बदलनी होगी।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

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