मोदी के आगे विपक्ष क्यों नदारद?

मोदी के आगे विपक्ष क्यों नदारद?

अभी दो साल बाकी हैं लेकिन टाइम्स ऑफ इंडिया के ताजा सर्वे के अनुसार अगर आज चुनाव हुए तो 84 प्रतिशत की राय है कि नरेंद्र मोदी आज जैसे या उससे अधिक बहुमत से जीत कर आएंगे। राहुल गांधी के लिए तो खासकर हालिया उत्तर प्रदेश चुनावों में मुंह की खाने के बाद 2019 के चुनाव ताबूत में आखिरी कील साबित हो सकते हैं। इस संभावित मोदी सुनामी से उनके और उनकी पार्टी के बचने का एक ही उपाय है कि वे अपनी मौजूदा रीति-नीति और राजनैतिक शैली को कब छोड़ पाते हैं। यही शैली उन्हें बेमानी बनाती जाती है।

उनके लिए अपने और अपने खानदान को बचाने का आखिरी मौका 2019 के चुनाव ही हैं। अभी तक वे पार्ट टाइम नेता हैं और राजनीति का समय बिताने का एक और साधन भर मानते हैं। उसकी ओर वे तभी रुख करते हैं जब बाकी मौज-मस्ती से उनका ऊब जाता है।

लेकिन इसके पहले के चुनावों के बुरे अनुभव और बदतर तो यह कि गोवा और मणिपुर में अपने लुंज-पुंज रवैए के कारण सरकार बनाने की स्थिति में आकर भी मौका गंवा बैठने के बाद सामान्य तौर पर उनके मन में कोलाहल मचना चाहिए था लेकिन उनके पार्टी के लोग ही उन्हें सामान्य नहीं मानते।

मध्य प्रदेश के एक इंजीनियरिंग के छात्र ने गीनिज बुक ऑफ वल्र्ड रिकॉर्ड्स में पूरे शुल्क के साथ यह प्रस्ताव भेजा है कि 27वां चुनाव हारने की ओर बढऩे के लिए राहुल का नाम वल्र्ड रिकॉर्ड में शामिल किया जाना चाहिए। इसलिए राहुल को अपनी ही पार्टी में अपनी प्रासंगिकता साबित करनी होगी। बदतर तो यह है कि उनकी पार्टी भी मानने लगी है कि प्रचार और मीडिया में उनकी सक्रिय हिस्सेदारी ही पार्टी उम्मीदवारों की हार की मुख्य वजह है। अब ज्यादातर पार्टी उम्मीदवार नहीं चाहते कि वे उनके क्षेत्र में आएं।

उनके बारे में कई तरह के चुटकले चल पड़े हैं। बदतर तो यह है कि लोग मानने लगे हैं कि राहुल ऐसे ही हंसी के पात्र हैं। उत्तर प्रदेश चुनाव प्रचार के दौरान आखिलेश यादव के साथ साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस में वे प्रदेश की कुल सीटें भूल गए तो सोशल मीडिया में काफी दिनों तक मजाक चलता रहा। उनकी साख इतनी कमजोर है कि अमेठी की कुल पांच सीटों में से चार भाजपा जीत गई और एक सपा ले गई। इससे साबित होता है कि राहुल की लोगों के बीच कोई साख नहीं बची है। लोगों से यह खारिज होना ही उनके लिए खतरे की घंटी है। ऐसा लगता है कि वे अपनी जड़ें गंवा बैठे हैं।

अगर नेता के सामने ही यह संकट हो कि वह किसी क्षेत्र से जीते तो वह अपनी पार्टी के उम्मीदवारों को कैसे जितवा पाएगा। नेता की तो काबिलियत ही यह होती है कि वह अपनी पार्टी के उम्मीदवारों को विधायिका में पहुंचाने में अहम भूमिका निभाए। ज्योतिरादित्य सिंधिया का यह कहना कि राहुल मोदी से दो-दो हाथ को तैयार हैं, पार्टी में जान डालने और हतोत्साहित कार्यकर्ताओं में जोश भरने का साधन मात्र है।

उनका सबसे बड़ा दुख यही है कि उनका धुर विरोधी हर मोर्चे पर मजे में है। टाइम्स ऑफ इंडिया डॉटकॉम और उसके सयहयोगी वेबसाइट के सर्वेक्षण में ‘‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने अपने पहले तीन साल के कुल कामकाज में अच्छा प्रदर्शन किया है।‘’

सर्वेक्षण में करीब दस लाख पाठकों ने हिस्सा लिया। उसमें 77 प्रतिशत का कहना था, ‘‘मोदी सकार का कामकाज सबसे अच्छा रहा है।‘’ ‘मोदी सरकार के कामकाज को कैसे आंकते हैं?’ सवाल के जवाब में 48 प्रतिशत ने बहुत अच्छा और 28 प्रतिशत ने अच्छा बताया।

करीब तीन महीने पहले एक और सर्वेक्षण में यह अंक 61 प्रतिशत था। इतने लोगों ने कहा कि वे मोदी के कामकाज से एकदम खुश हैं। लेकिन 100 दिनों में ही 61 प्रतिशत से आगे बढ़ गया।

ऐसं ऊंचे प्रतिशत से मोदी के विरोधियों में यकीनन डर बैठ गया होगा। इसी से साबित होता है कि मोदी किसी भरोसे से देश की राजनीति की दिशा बदल रहे हैं।

राहुल और दूसरे नेताओं को यह चिंता सता रही है कि नोटबंदी जैसी ‘गलती’ करके, सरकारी नीतियों में हिंदुत्व की विचारधारा थोपकर धु्रवीकरण करने के बावजूद कैसे इतने लोकप्रिय बने हुए हैं। उनकी सभाओं में भारी भीड़ जुटती है और उन पर सबसे अधिक भरोसा किया जाता है।

सब कुछ के बावजूद मोदी की लोकप्रियता का सबसे बड़ा सबूत उत्तर प्रदेश चुनावों में भाजपा को मिली भारी जीत है। उनकी यही काबिलियत रहस्यमय है। वोअर ज्यादातर सरकारों से तीसरे साल में ऊबने लगते हैं। इसे ही एंटी-इंकंबेंसी कहा जाता है। विपक्षी खेमे में ऐसे हताशाजनक माहौल में तीन साल पूरे करने पर मोदी सरकार का जश्न और परेशानी पैदा कर जाता है।

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ज्यादातर विपक्ष को डर है कि आरएसएस की मदद से मोदी गैर-भाजपा शासित राज्यों में अपनी सरकार की उपलब्धियों से वोटरों को लुभा रहे हैं। विपक्ष को पूरा यकीन है कि मोदी अपना जन संपर्क कार्यक्रम 26 मई के आगे करते रहेंगे और वे चुनावी मोड़ में ही बने रहेंगे।

अपनी सरकार की उपलब्धियों के लिए भारी प्रचार अभियान से पता चल जाता है कि मोदी के दिमाग में क्या है। केंद्र और भाजपा शासित राज्यों के सभी मंत्रियों, सांसदों, विधायकों, पार्टी पदाधिकारियों के लिए खास इलाके निर्धारित किए गए हैं, जहां वे खुद जाकर बताएंगे कि सरकार सफलतापूर्वक क्या कर रही है। तमाम योजनाएं, आर्थिक सुधार, गरीबों के कल्याण, हुनर प्रशिक्षण और जितने भी कार्यक्रम अपनाए गए हैं, उनके बारे में बताया जाएगा। वे यह भी बताएंगे कि सबका साथ सबका विकास पर सख्ती से अमल होगा।

मोदी सरकार की योजना पर राहुल गांधी ने फौरन प्रतिक्रिया की कि सरकार हर मोर्चे पर नाकाम है और वह यह सब अपनी नाकामी को छुपाने के लिए कर रही है।

उत्तर प्रदेश में भारी हार के बाद अपने प्रासंगिक बनाए रखने को जूझ रहे राजनैतिक दलों ने मादी सरकार के तीन साल के जश्न में 2019 की चुनावी तैयारी को सुंघ लिया। लेकिन मोदी लहर से निबटने के लिए उन्होंने अभी तक कोई कदम नहीं उठाया है।

ज्यादातर नेता राजनैतिक अदूरदर्शिता के शिकार हैं और भारतीय मानस को नहीं पढ़ पाते हैं। ज्यादातर नेता एकदम जमीनी काम से उठे हैं लेकिन जाति के नेता होने के नाते उनका नजरिया अदूरदर्शी है। वे जाति समीकरण और गठजोड़ के आगे नहीं सोच पाते। मायावती और ममता पूरी तरह से मुस्लिम समर्थन पर टिकी हुई हैं। लालू यादव मुसलमान-यादव की बात करते हैं। इन सबकी राजनीति अपने राज्य की सीमा तक सीमित है। मायावती ने बसपा को राष्ट्रीय पार्टी बनाना चाहा। कई राज्यों में उम्मीदवार उतारे। उनके उममीदवार दिल्ली, पंजाब और उत्तर प्रदेश में जीते भी। लेकिन हाल के चुनावों में उनकी पार्टी से वोट गयब हो गए। अरविंद केजरीवाल भी लुकाछिपी का खेल खेलते रहे हैं।

समूचा विपक्ष ही बेजार लगता है। समाजवादी पार्टी चाचा-भतीजा युद्ध में उलझी है, दोनों ही एक-दूसरे को साफ करने में लगे हैं। उनके पास मोदी से लोहा लेने का समय नहीं है। नीतीश को एहसास हो गया है कि लालू और उनकी संतानों के बेनामी और दूसरे धंधों में ध्यान लगाने उनके पास भाजपा की मदद से ही मुख्यमंत्री बने रहने का विकल्प है इसीलिए मोदी को नाखुश करने से परहेज कर रहे हैं। कुछ नहीं से कुछ हाथ में रहना भला होता है। वे पहले से ऐलान कर चुके हैं कि वे 2019 में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नहीं हैं। बाकी दो अरविंद केजरीवाल और मायावती के लिए अपने घर को संभाले रखना ही मुश्किल हो रहा है। अब रह गई ममता दीदी। भाजपा ने उनके राज्य में ऐसी मुहिम चला रखी है कि वे अपने गढ़ से बाहर निकलने की फुर्सत नहीं निकाल पा रही हैं।

बहरहाल, ज्यादातर विपक्षी नेता खुद को आज कास चाणक्य मानते हैं लेकिन ज्यादातर अपनी नाक के आगे नहीं देख पाते। मोदी 2019 का अभियान शुरू कर चुके हैं और विपक्ष अभी राष्ट्रपति चुनाव के लिए एक साझा उम्मीदवार की तलाश में ही जुटा है। वे सभी गणित में इतने कमजोर तो नहीं हैं कि मोदी के उम्मीदवार के लिए वोटों की संख्या नहीं गिन पा रहे होंगे। इसलिए राहुल ने भी सब कुछ छोडक़र विपक्षी दलों के पीछे लगना ही बेहतर समझा है।

पहली दफा राहुल ने जिम्मेदारी बांटनी शुरू कर दी है। मोदी सरकार के तीन साल के जश्न की काट के लिए उन्होंने आरपीएन सिंह, रणदीप सुरजेवाला, सचिन पायलट और ज्योतिरादित्य सिंधिया की एक कमेटी बनाई है। ये नेता देश के कोने-कोने में जाकर मोदी सरकार की नाकामियों की जानकारी लोगों को देंगे। राहुल ने कहा, देश में असहनशीलता का माहौल है। अगर कोई कुछ कहता है तो उसे देश विरोधी बता दिया जाता है। सरकार तय करती है कि लोग क्या खाएं, क्या पहनें, क्या पढ़ें। वह अपने सोच-विचार के हिसाब से नीतियां आगे बढ़ा रहे हैं।’’

पायलट ने कहा कि कांग्रेस देश के लोगों के सामने सरकार चलाने का वैकल्पिक खाका पेश करेगी और भाजपा की पोल खोलेंगे कि कैसे उसने सत्ता में आने के लिए ऊंचे वादे किए और अब उस पर नाकाम है। कांग्रेस ने एक वीडियो ‘तीन साल बरबाद, लीपापोती सरकार’ भी तैयार किया है।

कांग्रेस के नेताओं ने यह आरोप भी लगाया कि सरकार के वरिष्ठ मंत्री ने विजय माल्या और ललित मोदी को देश से भगाने में मदद की। मनीष तिवारी तो यहां तक कह गए कि भाजपा भारत विचार में यकीन ही नहीं करती।

इन विरोधों से मोदी पर कितना असर?

सच्चाई यही है कि मोदी की कुछ अर्जित ताकत है तो कुछ कमजोरियां भी हैं, जिनका मोदी बचाव नहीं कर सकते। माओवादी सीआरपीएफ के जवानों को मार रहे हैं। कश्मीर के हालात इतने बदतर कभी नहीं थे। बेरोजगारी के आंकड़े भयावह हैं। दलितों और महिलाओं के खिलाफ अत्याचार और उत्पीडऩ रोजमर्रा की बात बन गए हैं। यानी बहुत कुछ नहीं बदला है।

मोदी के न्यू इंडिया के बारे में भी शायद ही कुछ है। ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ के बावजूद सैनिकों के सिर कलम किए जा रहे हैं, सीमा पर गोलीबारी जारी है, पाकिस्तान एक भारतीय को फांसी देने की धमकी दे रहा है। सरकार की रणनीति पाकिस्तान को विश्व मंच पर अलग-थलग करने की है लेकिन लगता है भारत ही अलग-थलग हो रहा है।

तो, मोदी की राजनैतिक सफलता है क्या? आज जब नगर निगम के चुनाव भी मोदी के ना पर लड़े जा रहे हैं तो यह दलील दी जा सकती है कि मोदी आज 2014 की गर्मियों से ज्यादा लोकप्रिय हैं। मोदी की लोकप्रियता का रहस्य राजनैतिक बहस को अपने मनचाहे विषय की ओर मोड़ लेने की काबिलियत में है। और इसके लिए साहस की जरूरत है। मोदी बड़ा सोचते हैं और परंपरागत ढर्रे पर नहीं चलते। वे जोखिम उठाते हैं, भले उसमें मात खा जाएं। लेकिन उसके लाभ भी बड़े हैं। उनकी लाहौर यात्रा बेमानी साबित हुई लेकिन नोटबंदी से भारी राजनैतिक सफलता हासिल हुई।

मोदी सपना देखते हैं और अमित शाह के साथ असंभव को संभव बनाने का बीड़ा उठाते हैं कि भाजपा उन राज्यों में भी जीते, जहां उसका जनाधार नहीं है। मोदी का मंत्र ‘रिफॉर्म, परफॉर्म, ट्रांसफॉर्म और इंफॉर्म’ का काफी लाभ मिला है। वे अच्छे वक्ता हैं और उनके भाषणों को लाइव करके टीवी चैनल अच्छी टीआरपी पा लेते हैं। इसमें दो राय नहीं मोदी की यह खुशनसीबी है कि राहुल गांधी बहुत ही खराब वक्ता हैं।

मोदी उन मीडिया घरानों को बॉयकॉट करते हैं, उन्हें बदनाम करते हें, जो उनकास राग नहीं अलापते। यह नुस्खा पुराने नेताओं की समझ के बाहर है। अपना राग अलरापने वाले मीडिया को तोहफा देकर वे बाकियों को लाइन में लाते हैं। सभी बड़े चैनल उनका राग अलाप रहे हैं और एक जैसे हो गए हैं। मोदी की दूसरी बढ़त यह है कि अपनी बात दिलचस्प ढंग से रखते हैं। विरोधी उनका माखैल उड़ाते तो उससे उनको अपने खिलाफ इंकंबेंसी से निजात मिल जाती है।

सच्चाई यही है कि मोदी माहिर रणनीतिकार हैं जो आलोचकों और विरोधियों को बेमानी बना देते हैं। उनमें देश के लोगों की नब्ज की गहरी समझ है और उनकी जरूरतों के हिसाब से उन्होंने योजनाएं शुरू की हैं।

मोदी की इस माहिर राजनीति के आगे राहुल नौसिखुए लगते हैं। दुर्भाग्य से, उन पर युपीए सरकार की नाकामी का बोझ भी है। 2004-2014 का वह दौर लाखों करोड़ों के घोटालों की वजह से इतिहास मे हमेशा बदनाम रहेगा।

राहुल बस यही उम्मीद कर सकते हैं कि मोदी की इस सुनामी में अपना राजनैतिक वजूद बचाए रख पाएं और दूसरे बड़े नेताओं को मोर्चा संभालने दें। जो भी हो दिलचस्प दौर आ रहा है। जब भी राहु आपने धुर विरोधी मोदी से टकराते हैं, अशोभनीय टिप्पणियां भी शुरू हो जाती हैं। यानी 2019 में दोनों के बीच और तीखी जंग होगी।

 

विजय दत्त

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