हिन्दू-मुस्लिम ध्रुवीकरण कितना सच कितना झूठ

हिन्दू-मुस्लिम ध्रुवीकरण  कितना सच कितना झूठ

‘’साहब मोदी एक स्ट्रांग लीडर हैं। एक्शन लेने वाले नेता हैं।‘’ 27 साल के टैक्सी ड्राईवर जाकिर ने ये बात फरवरी के महीने में मुझे कही थी। टैक्सी चलाने वाले जाकिर कोचीन में रहते हैं और मैं उनसे नोटबंदी पर बात कर रहा था। जाकिर का कहना था कि नोटबंदी से गरीबों का फायदा होगा। प्रधानमंत्री मोदी से वे इसलिए प्रभावित थे, क्योंकि जाकिर को लगता है कि देश में अब कुछ चीजों पर एक्शन लेने की सख्त जरूरत है।

अब से कोई तीन साल पहले मुबई के अब्दुल ने मुझसे कहा था ‘‘साहब क्या मोदी को पता होएंगा कि मैंने भी उसको वोट दिया है?’’  यह 2014 के आम चुनावों की बात है तब तक नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री नहीं बने थे। 28 साल के अब्दुल ने ये बात मुझे अपै्रल 2014 में कही थी।

इसी तरह दिल्ली के महरौली के पास लाडो सराय में रहने वाले कोई 35 वर्षीय दिलनवाज ने कहा था कि इस बार उनके कुनबे के 36 सदस्यों ने कांग्रेस को वोट न देकर बीजेपी को वोट दिया है। जब मैंने उनसे पूछा था कि लोग तो कहते हैं कि बीजेपी तो दंगे करवाती है तो उन्होंने मुझसे कहा था कि ‘दंगे कौन नहीं करवाता? और फिर बीजेपी ने कुछ ऐसा वैसा किया तो उसे भी देख लेंगे। मगर ट्राई करने में क्या नुकसान?’

जाकिर, अब्दुल और दिल्ली के दिलनवाज हिन्दू-मुस्लिम धु्रवीकरण की प्रचलित आम धारणा को तोड़ते हैं। मैं नहीं कहता कि ये तीनों सारे मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करते हैं। मगर यह भी उतना ही सही है कि तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग, मीडिया में ‘पोलराईजेशन’ के झंडावरदार और मुस्लिम वोटों के कथित ठेकेदार भी मुस्लिम हितों के एक मात्र नुमाइंदे नहीं हैं। सारे मुस्लिम समाज को एक ही लाठी से हांकने की प्रवृत्ति उन्हें एक झुंड के रूप में देखती है, जिसकी पृष्ठभूमि में आजादी से पहले की द्धिराष्ट्रवादी सोच और आजादी के बाद से चल रही वोट की राजनीति है।

दिक्कत है कि देश में अल्पसंख्यकवाद के नाम पर मुस्लिम समाज को महज एक वोट के रूप में ही देखा जाता है और मुसलमानों का नेतृत्व करने का दावा करने वाले दल और नेता उन्हें एक राजनीतिक झुंड से ज्यादा नहीं समझते हैं। मुसलमानों को भय या लाभ के नाम पर जमा करना फिर उनका राजनैतिक इस्तेमाल- इसी को सेकुलरवाद बता दिया गया है। सोचिए यूपी चुनाव के वक्त जब सुश्री मायावती ने ताल ठोककर कहा कि उन्होंने सबसे ज्यादा मुसलमानों को टिकट दिया है तो बीएसपी या मायावती को किसी ने साम्प्रदायिक नहीं कहा। यानि साम्प्रदायिक का तमगा सिर्फ कथित रूप से हिन्दू संगठनों पर ही लगाया जा सकता है? क्या यह बौद्धिक खोखलापन नहीं?

2014 के आम चुनावों के बाद और खासकर मार्च के महीने के यूपी विधानसभा के चुनाव परिणाम के बाद इन नतीजों को राजनीतिक तौर पर हिन्दू वोटों की लामबंदी यानि हिन्दू-मुस्लिम धु्रवीकरण के रूप में चित्रित करने की होड़ सी लगी है। मुझे लगता है कि ये बौद्धिक आलस्य, राजनीतिक दिग्भ्रम और वैचारिक दुराग्रहों से उपजा सतही आंकलन है। क्या मुसलमान हमेशा मुसलमान के तौर पर ही सोचता है? क्या उसके बीच स्त्री-पुरूष, ग्रामीण-शहरी, ऊंच-नींच, युवा-प्रौढ़, शिक्षित-अशिक्षित जैसे वर्गीकरण नहीं है? क्या शिक्षा, रोजगार और विकास के सपने मुस्लिम युवा को प्रभावित नहीं करते? कई सवाल हैं जो इस सहज धारणा को कठघरे में खड़ा करते हैं।

इसी के साथ आज जब तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई कर रहा है तो क्या मुस्लिम महिलाओं को उस आजादी का ख्याल नहीं आता जो भारतीय नागरिक होने के नाते देश की किसी भी महिला को इस देश का संविधान देता है? मुसलमानों के प्रति बौद्धिक दुराग्रह का आलम तो यह है कि जो अन्य महिलाओं के लिए पर्दा प्रथा को महिला दमन और शोषण का प्रतीक मानते हैं, उन्हें हिजाब में धार्मिक अधिकारों की याद आ जाती है। धार्मिक कठमुल्लेपन के असर में अनुदारवादी ऐसा कहें तो शायद समझ भी आए। मगर उदारवाद और आधुनिकता का नाम जपने वाले संगठन और बुद्धिजीवी ऐसा कहते हैं तो फिर यह बौद्धिक दोगलापन नहीं तो क्या है?

ये लोग जाकिर, अब्दुल और दिलनवाज की आवाज को अनसुना क्यों करते हैं? अगर मुस्लिम समाज के एक हिस्से में बदलाव की तड़प है तो उसे नेतृत्व देने  के लिए आवाज क्यों नहीं उठती? जब आप सिर्फ हिन्दू-मुस्लिम ध्रुवीकरण का चश्मा पहनकर ही राजनीतिक आंकलन करते हैं तो फिर चाहे अनचाहे जाकिर, अब्दुल और दिलनवाज को आप उस खेमे में ढकेलते हैं जहां से वो बाहर आना चाहते हैं। सिर्फ मजहबी पहचान छोडक़र झुंड की मानसिकता से बाहर आने की इन कोशिशों को ध्यान से देखने की जरूरत है। इन आवाजों को सुनकर उन्हें पहचानकर आवाज देने की जरूरत है तभी ये देश धु्रवीकरण के इस मकडज़ाल से बाहर आ पायेगा।

उमेश उपाध्याय

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