डॉ. वल्लभभाई कथीरिया रक्तदान के पुरोधा

डॉ. वल्लभभाई कथीरिया  रक्तदान के पुरोधा

शरीर के सभी अंग मूल्यवान होते है। ईश्वर ने हमारे शरीर और पर्यावरण की संरचना बिल्कुल एक जैसी की है।  जैसे सूर्य के बिना पृथ्वी अधूरी है। जल, वायु और अग्नि के बिना हमारे पर्यावरण का कोई अस्तित्व नहीं है। उसी प्रकार रक्त के बिना इस जीवन रूपी शरीर का कोई उपयोग नहीं है। अत: रक्त का हमारे जीवन में कितना महत्व है हम सभी इससे परिचित है। यही कारण है कि हमारे हिन्दू सभ्यता में रक्तदान को ‘महादान’ का दर्जा दिया गया हैं। इसी कड़ी में स्वैच्छिक रक्तदान एक ऐसा पुण्य का कार्य है, जिसका कोई विकल्प नहीं है, क्योंकि ‘महादान’ द्वारा किसी को नवजीवन देकर जो आत्मिक सुख प्राप्त होता है, उसका न तो मूल्यांकन किया जा सकता है और न ही उसे किसी शब्दों में व्यक्त किया जा सकता है अर्थात् रक्तदान ‘महादान’ है।

रक्त हमारा जीवन-आधार है। इसके बिना हम जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते। जब बात रक्तदान की आये तो रक्तदान तब होता है जब एक स्वस्थ व्यक्ति स्वेच्छा से अपना रक्त किसी दूसरे व्यक्ति को देता है। हमारे  शरीर में हमारे वजन का 8 प्रतिशत  रक्त रहता है और इस प्रकार से यह माना जाता है कि एक स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में सामान्यत: 5 से 6 लीटर रक्त होता है। 18 से 65 वर्ष की आयु का कोई भी स्वस्थ व्यक्ति जिसका वजन 48 किलोग्राम से अधिक हो तथा जिसने पिछले तीन माह में रक्तदान नहीं किया हो, वह रक्तदान कर सकता है। एक बार के रक्तदान में 350 मिलीग्राम  रक्त दिया जाता है, जो मात्र 21 दिनों में दोबारा शरीर में बन जाता है। वैसे भी हर तीन महीने बाद पुराने रक्तकण मर जाते हैं और पित्त की थैली में चले जाते हैं, उनकी जगह यकृत (लीवर) द्वारा नए पैदा करने की प्रक्रिया जारी रहती है। रक्तदान के उपरांत भी हमारे शरीर की समस्त क्रियाएं उसी प्रकार से चलती रहती हैं जैसी कि रक्तदान करने से पूर्व चलती है। चिकित्सकों का मानना है कि रक्तदान खून में कोलेस्ट्राल को बनाने से रोकता है और शरीर में रक्त बनने के प्रक्रिया तंत्र को तेज कर देता है। रक्त लेते समय सावधानीपूर्वक साफ-सुथरी सूई का उपयोग होना चाहिये, ताकि संक्रमित बीमारियों से बचा जा सके। रक्तदाता तथा जरूरतमंद व्यक्ति का ब्लड ग्रुप मिलाना आवश्यक है। सरकार के निर्देशानुसार ‘रक्त संग्रहण केन्द्रों’ पर सुरक्षित व्यवस्था अपनाई जाती है, जहां रक्तदान से पूर्व रक्तदाता का स्वास्थ्य परीक्षण किया जाता है और इसी प्रकार रक्त चढ़ाने से पहले प्रत्येक इकाई की मलेरिया, सिफलिस, हिपेटाइटिस-बी, सी व एच.आई.वी. एवं एड्स की जांच की जाती है, ताकि सुरक्षित रक्त ही रक्त प्राप्तकर्ता को मिल सके। मानव व समाज की सेवा रक्तदान कर की जा सकती है। रक्तदान के बारे में तरह-तरह की गलत धारणाएं होती हैं कि रक्तदान करने वाला कमजोर हो जाता है। उसकी रोग प्रतिरोधात्मक क्षमता कम हो जाती है। लेकिन ये सब भ्रांतियां हैं। आवश्यकता है तो केवल पहल और जागरूकता की।

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भारत में दान की परम्परा प्राचीन काल से है। गोदान करने की परंपरा तो आज भी घर-घर में है। रक्तदान से मौत से जूझ रहे मरीज, दुर्घटना से ग्रसित लोग, आपरेशन करवाने वाले मरिजों की जान बचाई जाती है। अघ्ययन में पाया गया है कि बहुत प्रचार-प्रसार के बावजूद भी कम लोग ही इस पुण्य कार्य में अपना योगदान करने के लिए  आगे आते हैं। कई सामाजिक सस्थानों के सदस्य व उद्योग समूहों में कार्यरत समझदार लोग इस विषय की गंभीरता को समझते हुए रक्तदान करने/कराने लगे हैं ।

वैसे स्वैच्छिक रक्तदान यानी जो रक्तदान अपनी मर्जी से किया जाए उसी को सुरक्षित माना जाता है क्योंकि इनमें रक्त संचरण जनित संक्रमण न के बराबर होता है । यह भी बात आती है कि रक्तदान क्यो करें तो स्वस्थ लोगो का नैतिक फर्ज है कि बिना किसी स्वार्थ के मानव की भलाई करें। अगर हमारे रक्त से किसी की जान बच सकती है तो इस बात पर हमे गर्व होना चाहिए कि हमने नेक काम किया है और अब तो विज्ञान ने इतनी तरक्की कर ली हैं कि एक व्यक्ति द्वारा दिया गया खून तीन जिंदगियां भी बचा सकता है। क्या आपको पता है कि देश मे हर साल लगभग 80 लाख यूनिट रक्त की जरूरत होती है।

इस क्षेत्र में एक कहानी गुजरात के ‘गौ सेवा एंड गौचर बोर्ड’ के चेयरमैन, पूर्व केंद्रीय मंत्री और चार बार के सांसद डॉ. वल्लभभाई कथीरिया की है। श्री वल्लभभाई कथीरिया देश के ईकलौते ऐसे राजनेता है जिन्होंने अभी तक 125 बार रक्तदान किया हैं। उनका कहना है कि वह इस काम को उनके गुरु डॉ. विष्णु गणेश मावलंकर से प्रेरित होकर कर रहे हैं। श्री कथीरिया इस कार्य को छात्र जीवन से ही कर रहे हैं। श्री कथीरिया ने 100वीं बार रक्तदान 2003 में केंद्र में मंत्री रहते हुए किया  था। उनका मानना है कि रक्तदान ‘महादान’ है जो हमारे जीवन का एक महत्वपूर्ण भाग होना चाहिए। वो कहते हैं कि जब हम अपने रक्त को दान करते है तो हमारा पुराना रक्त निकलता है और नए रक्त का स्वत: निर्माण होना आरम्भ हो जाता है जो हमें काफी स्वस्थ रखता है। यह केवल हमारे स्वास्थ के लिए ही लाभकारी नहीं है अपितु इससे किसी व्यक्ति की जान भी बच जाती है। कैंसर सहित अन्य दुर्घटना से प्रभावित लोगों को रक्त की सबसे अधिक आवश्यकता होती है। श्री कथीरिया का कहना हैं कि इस काम में और गति प्रदान करने के लिए सभी को आगे आने की आवश्यकता है।

श्री वल्लभभाई कथीरिया एक डॉक्टर होने के साथ-साथ एक सफल समाजसेवी, फिलॉन्थ्रोपिस्ट और एक ऊर्जावान व्यक्तित्व हैं जो लोगों में समाज के प्रति कुछ कर गुजरने के लिए स्वत: प्रेरित करते हैं और इसका उदहारण कृषि क्षेत्र में विकास के लिए उनके द्वारा जल सरक्षण के लिए डैम का निर्माण, ग्रामीण विकास, शिक्षा के लिए स्कूलों का निर्माण और अंगदान जैसे कई मूल्यवान कार्यों का सफल बनाना है।

 रवि मिश्रा

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