आचार्य श्रीमद् नित्यानंद सूरीजी: जिनका जीवन शांति की मशाल है

आचार्य श्रीमद् नित्यानंद सूरीजी:  जिनका जीवन शांति की मशाल है

धरती पर कुछ ऐसे व्यक्तित्व होते हैं जो असाधारण, दिव्य और विलक्षण होते हैं। हर कोई उनसे प्रभावित होता है। ऐसे व्यक्तित्व अपने जीवन में प्राय: स्वस्थ, संतुष्ट और प्रसन्न रहते हैं। उनमें चुनौतियों को झेलने का माद्दा होता है। वे कठिन परिस्थितियों में भी अविचलित और संतुलित रहते हैं। बिजी रहते हुए भी उनकी लाइफ  ईजी होती है। वे स्वयं में ही खोये हुए नहीं रहते, बल्कि दूसरों में भी अभिरुचि लेते हैं। अपनी इन्हीं विशिष्टताओं के कारण वे अन्यों के लिए आदर्श या प्रेरणा के स्रोत बन जाते हैं। भारतवर्ष की धार्मिक, दार्शनिक तथा आध्यात्मिक पृष्ठभूमि में ऐसे महान दार्शनिकों, संतों, ऋषियों एवं विलक्षण महापुरुषों की श्रृंखला में एक नाम है गच्छाधिपति आचार्य श्रीमद् विजय नित्यानंद सूरीश्वरजी। वे शांतिदूत, तीर्थोद्धारक, राष्ट्रसंत एवं मानव-कल्याण के पुरोधा के रूप में विख्यात हैं। आचार्य श्रीमद् विजय नित्यानंद सूरीश्वरजी भगवान ऋषभ और महावीर की परम्परा के सशक्त प्रतिनिधि है, जिन्होंने जैन संस्कृति एवं जैन तीर्थों के विकास के लिये अनूठे उपक्रम किये हैं। उनका हर उपक्रम प्रशंसा या किसी को प्रभावित करने के लिये न होकर स्वान्त: सुखाय एवं स्व-परकल्याण की भावना से प्रेरित होता है। इसी कारण उनके उपक्रम सीमा को लांघकर असीम की ओर गति करते हुए दृष्टिगोचर होते हैं।

भारत की राजधानी दिल्ली में धर्मपरायणा श्रीमती राजरानी की रत्नकुक्षि से वि.सं. 2015 द्वितीय श्रावण वदि चतुर्थी पिताश्री चिमनलालजी जैन के चमन में खिलने वाले इस पुष्प को बचपन का नाम मिला प्रवीण। बालक का दिव्य भाल व कांतियुक्त काया को देखकर सभी सहसा कह उठे कि देवलोक से कोई महान पुण्यशाली जीव अवतरित हुआ है। आपके पिताश्री में एक ओर तो राष्ट्रीयता की भावना कूट-कूट कर भरी हुई थी तो दूसरी तरफ संसार के प्रति निरासक्ति के भाल संन्यस्त जीवन जीने के लिए आकृष्ट कर रहे थे।

बालक प्रवीण का अतिलघु अवस्था में अनेक गुणों को अपना लेना, हिताहित का कुछ अंशों में भान हो जाना सचमुच ही महानता की निशानी थी। इसलिए कहा है- ‘होनहार वीरवान के होत चिकने पात।’ प्रवीण की संयम मार्ग पर अग्रसर होने की बलवती भावना देखकर माता-पिता भी विस्मित हो उठे। फलस्वरूप वि.सं. 2024 मार्गशीर्ष शुक्ला दशमी के शुभ दिन मात्र 9 वर्ष की अल्पवायु में उत्तर प्रदेश के बड़ौत नामक शहर में राष्ट्रसंत आचार्य श्रीमद् विजय समुद्र सूरीश्वरजी के करकमलों से माता-पिता, तीनों भाई तथा बाबाजी कुल एक ही परिवार के छह सदस्यों ने एक साथ भगवती दीक्षा ग्रहण कर न केवल एक नया इतिहास रचा बल्कि अपना जीवन स्व-परकल्याण हेतु समर्पित कर दिया। गुरु समुद्र ने आपश्री को मुनिश्री नित्यानंद विजय नाम प्रदान करके सांसारिक पिता मुनिश्री अनेकांत विजयजी म.सा. का शिष्य घोषित किया।

गुरु समुद्र की कल्पतरूतुल्य शीतल छत्रछाया में बाल मुनियों का सर्वांगीण विकास प्रारंभ हुआ। आपने संस्कृत, प्राकृत, न्याय, व्याकरण, साहित्य सहित जैनागमों का तलस्पर्शी अध्ययन किया। बालवय में ही प्रवचनपटुता को प्राप्त आपकी गुरु समुद्र के पत्र-व्यवहार का संपूर्ण भार स्वयं संभालते। महातपस्वी मुनिराज श्री अनेकांत विजयजी का मात्र तीन वर्ष के संयम पर्याय में ही कालधर्म हो गया था। पिता के असह्य वियोग से तप्त आपश्री की मानसभूमि को गुरु समुद्र के स्नेह संबल से बहुत बल मिला तथा जब गुरु समुद्र अस्वस्थ हुए तो उन्होंने बाल मुनियों की सार-संभाल का दायित्व सर्वधर्म समन्वयी, अध्यात्मयोगी पूज्य गणिवर्य श्री जनक विजयजी म.सा. को सौंपा। उनकी असीम अनुकंपा एवं सर्वोत्कृष्ट प्रशिक्षण के फलस्वरूप आपके व्यक्तित्व में उत्तरोत्तर निखार आता चला गया। अध्यात्म की उच्चतम परम्पराओं, संस्कारों और जीवन-मूल्यों से प्रतिबद्ध इस महान विभूति एवं ऊर्जा का सम्पूर्ण जीवन त्याग, तपस्या, तितिक्षा और तेजस्विता का प्रतीक बना हैं और प्रतिभा और पुरुषार्थ का पर्याय बना हैं।

आचार्य नित्यानंद जी ने गुरुवर इन्द्र के भी निजी सचिव, प्रमुख सलाहकार के रूप में वर्षों तक कार्य करते हुए समुदाय विकास के अनेकानेक अनूठे कार्य किए। आपकी निर्णय लेने की क्षमता, विनय, विवेक-संपन्नता, शासनसेवा की तीव्र उत्कंठा से अभिभूत होकर परमार क्षत्रियोद्धारक चारित्रचूड़ामणि आचार्य श्रीमद् विजय इन्द्रदिन्न सूरीश्वरजी ने आपश्री को वि.सं. 2044 में ठाणे में गणि पदवी एवं वि.सं. 2047 में विजय वल्लभ स्मारक दिल्ली में पंन्यास पदवी तथा वि.सं. 2047 में तीर्थोंधिराज श्री शत्रुंजय तीर्थ पालीताणा में आचार्य पदवी से विभूषित करते हुए पंजाब आदि उत्तरी भारत के क्षेत्रों की देखरेख व सार-संभाल का गुरुत्तर भार आपश्री को सौंपा था।

आचार्य नित्यानंद सूरीश्वरजी के स्वभाव में शीतलता व तेजस्विता का दिव्य समन्वय है इसलिए जालना (महाराष्ट्र) में दो गुटों के विवाद को मार्मिक प्रवचन के माध्यम से सुलझाया और द्वेष के दावानल को प्रेम की गंगा से बुझाया। फलस्वरूप सकल श्रीसंघ ने मिलकर आपश्री को ‘शांतिदूत’ पद से अलंकृत किया। इसी प्रकार श्रीगंगानगर में श्री आत्मवल्लभ कन्या महाविद्यालय की स्थापना की प्रेरणा देकर नारी जाति के उत्कर्ष हेतु आपश्री ने महनीय कार्य किए। अत: वहां सकल श्रीसंघ द्वारा आपको ‘शिक्षासंत’ पद नवाजा गया। पीलीबंगा, हनुमानगढ़ सूरतगढ़, नोहर, भादरा आदि क्षेत्रों में वर्षों से बंद पड़े मंदिरों के जीर्णोद्धार के अगणित कार्य करते हुए आपश्री ने अहर्निश अथक परिश्रम किए। परिणामत: ‘जीर्णोद्धार प्रेरक’ पद से आपश्री अलंकृत किये गये। खौड चातुर्मास में जन-जन के विकास व कल्याण के साथ शिक्षा के क्षेत्र में किये गए क्रांतिकारी कार्यों के कारण ही 38 कौम के गणमान्य लोगों ने आपश्री को ‘ज्ञानगंगा भगीरथ’ पद से सुशोभित किया। आपने तीर्थ, मंदिर और धर्म साधना केन्द्रों को संस्कृति का रक्षक मानकर तीर्थोद्धार के विविध कार्य कराए। फलस्वरूप 19 कल्याणों की भूमि अयोध्या तीर्थ में अंजनशलाका प्रतिष्ठा अवसर पर सेठ आनंदजी कल्याणजी पेढी के प्रमुख सेठ श्री श्रेणिक भाई की उपस्थिति में सकल श्रीसंघ द्वारा ‘कल्याणक तीर्थोद्धारक’ अलंकरण से आपको विभूषित किया। प्रसन्नचित्त होकर प्रकृति देवी ने स्वभावत: ही शांति, विनम्रता, शीतलता व वाणी में मधुरता आदि गुण आपको इस तरह प्रदान किए हैं मानों आप शांति व सौम्यता: की मुस्कुराती प्रतिमा है। इक्कीसवीं सदी के भाल पर अपने कत्र्तृत्व की जो अमिट रेखाएं उन्होंने खींची हैं, वे इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित रहेगी। तीर्थोद्धारक के साथ-साथ वे धर्मक्रांति एवं समाजक्रांति के सूत्रधार भी कहे जा सकते हैं। आपने अध्यात्म के सूक्ष्म रहस्यों को तलाशा है और आंतरिक ऊर्जा को जागृत किया है।

सदैव शांति, अहिंसा, सद्भाव प्रेम, करुणा तथा प्राणिमात्र की मुस्कुराहटपूर्ण विकास के लिए जीने वाले ऐसे कर्मयोगी राष्ट्रसंत विरले ही मिलते हैं। इस वर्ष आपका दीक्षा का 50वां वर्ष हैं, जिसे प्रयोजनात्मक एवं आयोजनात्मक रूप से दिल्ली में भव्य रूप में मनाया जा रहा है। आपका व्यक्तित्व और कर्तृत्व आध्यात्मिक शक्तियों का पुंज है। अपने पुरुषार्थ, प्रतिभा एवं कौशल के आधार पर अपने सफरनामे में आज वे अध्यात्म जगत की विशिष्ट शक्ति के रूप में वंदित, अभिनंदित हो रहे हैं।

 

ललित गर्ग

translate in french from englishмихаил безлепкин

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