जिंदगी एक रंगमंच

जिंदगी एक रंगमंच

रवींद्र कुमार दास के ‘प्रजा में कोई असंतोष नहीं’ शीर्षक कविता संकलन में सरल भाषा, मुहावरा और खास लहजा पाठक को आकर्षित करता है। इनकी कविताएं भले ही आज के दौर में अलग दिखती है लेकिन मन को सुहावनी करने वाली हैं।  देश-काल-बोध का काव्य-बोध में रूपांतरण, कठिन अध्यवसाय, आत्मसंयम और तीक्ष्ण अंतर्दृष्टि पर निर्भर करता है। कहना न होगा कि इस संग्रह की कविताएं इस पुस्तक की विशेषता हैं। कवि ने ‘मां! मैं झूठ नहीं कहता’ कविता में उन लोगों को कोसा है जो अपनी मातृ-भूमि को छोडक़र अमेरिका जैसे बाहरी देशों में अपना जीवन गुजारने लगते हैं और वहीं से देश की समस्याओं पर चर्चा करना आरंभ कर देते हैं। उन लोगों को तो ये भी नहीं पता होता कि देश किस प्रकार से चल रहा है। देश में किस प्रकार की समस्याएं हैं। ये लोग केवल बाहर के देशों में ही बैठकर देशप्रेम का रोना रोते हैं जो बिल्कुल ही आडंबर होता है। इन लोगों को तो बाहरी चमक-दमक  से अलग कुछ दिखाई  नहीं देता है। आज का समय आडंबर का हो गया है। आज लोगों को उनके कपड़ों से पहचाना जाने लगा है। इसपर कवि का कटाछ है कि चन्द रुपयों की गांधी जैसी टोपी पहनने से कोई महात्मा नहीं बन सकता, उसके लिए त्याग की आवश्यकता होती है।

प्रजा में कोई असंतोष नहीं

लेखक                    : रवीन्द्र कुमार दास

प्रकाशक                : बोधि प्रकाशन

मूल्य                      : 200 रु.

पृष्ठ                        : 204

वैसे ही किसी व्यक्ति को भले ही भूखे रहने की आदत क्यों न हो लेकिन वह सत्याग्रह जैसा आंदोलन नहीं कर सकता है। कवि लिखते हैं कि कुछ लोगों को साक्षात्कार में भी अभिनय करने की आदत होती है जिससे उनकी सच्चाई बाहर नहीं आ पाती है। अत: आवश्यकता है सफल साक्षात्कार की। वो आगे कहते हैं कि  मौन कोई भाषा नहीं, किंतु कई बार मौन अभिव्यक्ति का प्रतीक बन जाता है। मौन भी एक भाषा है। इसे भी एक भाषा में ही कहना पड़ता है। किंतु अपनी भाषा से किसी भी व्यक्ति का उपहास न करें । आपकी भाषा मुल्यवान है। इसके कई अर्थ हो सकते हैं। इसी पंक्ति को बढ़ाते हुए वो आगे लिखते है कि संबंध या रिश्ते को समझना किसी समस्या से कम नहीं है। इस समस्या को समझाने के लिए आम आदमी से लेकर एक बड़े से बड़ा समाजशास्त्री, बड़े से बड़ा दार्शनिक समझना चाहता है कि संबंघ क्या है जिसके आधार पर ही दुनिया और दुनियादारी सब कुछ टिकी है। सबको जीना होगा अपना-अपना जीवन नामक कविता के माध्यम से लखक लिखते है कि इस मायारूपी संसार में सबको अपना जीवन अकेले ही व्यतित करना है। भले कोई आपके साथ हमेशा खड़ा होने की बात क्यों न करता हो लेकिन  अंतत: हम सभी को स्वयं ही अपने भविष्य को संवारना होगा। यह सच्चाई है कि जब कोई समय पर साथ छोड़ दे तो हमे कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है लेकिन उसका निवारण भी हमारे ही हाथ में है।

यह लेखन थोड़ा जटिल अवश्य है लेकिन जीवन की वास्तविक घटनाओं पर आधारित है। इसमें कवि ने समाज को अपने इस काव्य से जोडऩे का भरपूर प्रयास किया है, जो जोडऩे में सफल भी होती है। देखने और दिखावन का अलहदापन इस कवि में कोई भी काव्य-रसिक सहज ही महसूस कर सकता है। अत: पाठक इसका  भरपूर आनंद ले सकते हैं।

रवि मिश्रा

 

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