केजरीवाल बाघ थे बघेला कैसे हो गये?

केजरीवाल बाघ थे बघेला कैसे हो गये?

आजकल उल्टी गिनती एक ‘सूचक’बन गई है, किसी महत्वपूर्ण काम की शुरुआत के लिए या किसी बड़े बदलाव के लिए। हमारे यहां भी कई उल्टी गिनतियां चल रही हैं। एक महत्वपूर्ण उल्टी गिनती पर देश की निगाहें लगी है। जुमा जुमा चार साल पहले पैदा हुई आम आदमी पार्टी की इस उल्टी गिनती की आग में दिल्ली नगर निगम चुनाव के नतीजे ने तेल का काम किया है। कुमार विश्वास को लेकर खड़ा हुआ संकट खत्म होने के साथ ही पार्टी के नेता अरविन्द केजरीवाज भ्रष्टाचार के आरोप से घिर गये हैं। अब सवाल ये उठ रहा है कि स्वच्छ राजनीति की वकालत करने वाले केजरीवाल क्या इस्तीफा देंगे। जिस तरह आरोपों की राजनीति से उन्होंने दिल्ली में अपनी जगह बनाई अब ठीक वैसे ही आरोपों से वे स्वयं घिर गए हैं। इस बार वे दिल्ली के हटाए गए जल मंत्री कपिल मिश्रा के निशाने पर हैं। कपिल मिश्रा ने दो करोड़ रु. कैश लेने की बंदूक केजरीवाल और मंत्री सत्येंद्र जैन पर तान दी। ईमानदारी एवं भ्रष्टाचार मुक्त राजनीति का नारा उछालने वाले केजरीवाल की राजनीति अब कौनसी करवट लेगी, देखना है। लेकिन यह स्पष्ट है कि उनकी और उनकी पार्टी की उल्टी गिनती तेजी से प्रारंभ हो गयी है।

निगम चुनाव के नतीजे एक तरह से मीडिया संस्थानों द्वारा कराए गए सर्वेक्षणों का प्रतिबिंब ही थे। उसके बावजूद केजरीवाल ने राजनीतिक अपरिपक्वता और अहंकार का परिचय देकर धमकाते हुए कहा कि चुनाव परिणाम उनके पक्ष में नहीं आए तो वह ‘ईंट से ईंट बजा’देंगे। अब लगता है उनकी ‘ईंट से ईंट बज’रही है क्योंकि उन पर भ्रष्टाचार का आरोप लगना उन पर राजनीति ग्रहण लगने के बराबर ही हैं और ऐसा लग रहा है कि आप की उल्टी गिनती थमती हुई प्रतीत नहीं हो रही है। यह तो होना ही था क्योंकि केजरीवाल भ्रष्टाचार के खिलाफ सबसे बड़े योद्धा के तौर उभरे थे और इसी की बदौलत जनता ने भरोसा भी किया और दिल्ली में बहुमत भी दिलाया। केजरीवाल मुख्यमंत्री बने। सरकार और उनके मंत्री-विधायक विवादों में घिरते रहे लेकिन केजरीवाल पर निजी तौर पर कम से कम भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं लगा लेकिन अब पूर्व सहयोगी कपिल मिश्रा ने न सिर्फ आरोप लगाया है, बल्कि मामले को आगे बढ़ाते हुए एंटी करप्शन ब्यूरो तक ले जाने की बात कर रहे हैं। इस तरह का आरोप लगना न केवल शर्मनाक है बल्कि एक गंभीर अपराध भी है। भ्रष्टाचार की जांच करने वाली एसीबी के सूत्रों ने कहा है कि कपिल मिश्रा ने जो आरोप लगाए है वो बेहद संगीन है, टैंकर घोटाले की जांच एसीबी पहले ही कर रहा है, कपिल मिश्रा ने जो शिकायत एलजी को दी है, अगर ये फाइल एलजी ऑफिस से एसीबी को भेजी जाती है तो पूरी जांच की जाएगी। क्या कुर्सी से चिपके रहने के लिए केजरीवाल इस मामले की जांच होने तक खुद को सरकार से अलग रखेंगे ताकि जांच प्रभावित न हो। क्या केजरीवाल आरोपों की जांच तक इस्तीफा देंगे?

केजरीवाल की आम आदमी पार्टी पर शुरुआती दिनों से चंदे के हेर-फेर के आरोप लगते रहे हैं। केजरीवाल पर आरोप है कि उन्होंने ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’के नेटवर्क का इस्तेमाल किया और गलत तरीके से चंदे की उगाही करते रहे। सबसे बड़ी बात है कि अन्ना आंदोलन के दौरान वो राजनीतिक पार्टियों को मिलने वाले चंदे में जिस पारदर्शिता की वकालत करते थे। जब अपनी बारी आई तो उन चंदों पर और उन्हें देने वाले नामों पर कुंडली मारकर बैठ गए। बड़ी बात ये है कि इस मामले में कई बार उनके अपने ही साथियों ने गंभीर आरोप लगाए हैं। केजरीवाल सरकार पर भ्रष्टाचार के और भी आरोप हैं।

अरविंद केजरीवाल पर निजी घूसखोरी का चश्मदीद गवाह भले ही पहली बार सामने आया हो, लेकिन दिल्ली में उनकी सरकार के भ्रष्टाचारों की लिस्ट तैयार की जाय तो वो बहुत ही लंबी हो सकती है। जैसे दिल्ली के विवादास्पद मुख्यमंत्री और उनके साले सुरेंद्र कुमार बंसल पर जाली कागजातों के आधार पर पीडब्ल्यूडी विभाग के ठेके लेने और फर्जी बिल बनाने के आरोप हैं। उसी तरह केजरीवाल ने राजेंद्र कुमार नाम के उस अफसर को अपना मुख्य सचिव बनाया जिसपर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप थे। डिप्टी सीएम समेत कई मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के कई मामले चल रहे हैं। उन पर केजरीवाल के टॉक टू एके कार्यक्रम के प्रचार के लिए धांधली की जांच चल रही है, तो स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन के कथित हवाला लिंक की छानबीन भी की जा रही है। दूसरों को ईमानदारी का सर्टिफिकेट देने वाले केजरीवाल के मंत्री जैन पर हवाला के माध्यम से 16.39 करोड़ रुपये मंगाने के आरोप हैं।

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आप एवं केजरीवाल के पतन का मुख्य कारण भ्रष्ट, नकारात्मक, अवसरवादी, स्वार्थी और झूठ पर आधारित राजनीति है। इसका एक बड़ा कारण अपने स्वार्थ एवं सत्ता की भूख भी है। राष्ट्र की मजबूती के लिये संकल्पित होने का ढोंग करने वाले जब देश को बांटने वाली विचारधारा से जुड़ जाते हैं तो उनका पतन निश्चित है। अन्ना आंदोलन की पैदाइश केजरीवाल की अधिनायकवादी मानसिकता और अहंकार ने देश की राजधानी को तो धुुंधलाया ही, साथ ही दिल्ली के प्रशासनिक, राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र में भी केवल अराजकता ही फैलाई है। जनता से सादगी और आदर्शवादी राजनीति का वादा करके प्रचंड बहुमत से दिल्ली में शासक बनने वाले केजरीवाल ने न केवल लोकतांत्रिक मूल्यों का उपहास किया बल्कि राजनीति को ही एक मखौल बना दिया। सरकारी सुविधाएं नहीं भोगने एवं ईमानदार-पारदर्शी सरकार चलाने का दावा करने वाले आप नेताओं ने क्या नहीं किया? पहले गाड़ी और बंगले लिए। फिर संवैधानिक प्रक्रियाओं और नियमों को ताक पर रखकर इक्कीस विधायकों को लाभ का पद दिया। पार्टी के कार्यक्रम में जनता के पैसों से 12 हजार रुपये की शाही थाली परोसने का आरोप लगा। यही नहीं आज ‘आप’ के कई विधायक किसी-न-किसी गंभीर आपराधिक मामले में आरोपित होते गए। इनमें से कुछ को गिरफ्तार भी किया जा चुका है। ईमानदारी, नैतिकता एवं पारदर्शिता का चोला ओढ़े ‘आप’ की सच्चाई धीरे-धीरे जनता के समक्ष बेनकाब होती गयी। दो वर्ष के कार्यकाल में दिल्ली में एंबुलेंस घोटाला, ऑटो परमिट घोटाला, टैंकर घोटाला, प्रीमियम बस सर्विस घोटाला और वीआइपी नंबर प्लेट घोटाला- न जाने कितने घोटाले एवं अपराध सामने आते गए।

यही कारण है कि दिल्ली विधानसभा की 70 में से 67 सीटों पर ऐतिहासिक जीत हासिल करने वाली ‘आप’को  जनता ने 2017 के स्थानीय नगर निकाय चुनाव में करारी हार का मुखौटा दिखा दिया। केजरीवाल को अभी इससे भी अधिक शर्मनाक हार एवं बदनामी झेलनी होगी। क्योंकि उन्होंने अहंकार एवं सत्ता मद में  अपने गुरु और 2011-12 के उस आंदोलन की मूल कल्पना के राष्ट्रवाद, लोकतंत्र, संविधान, नैतिकता और तिरंगे को ही झूठला दिया। समाजसेवी अन्ना हजारे का सारा जीवन राजनीतिक शुचिता एवं प्रशासनिक ईमानदारी के लिये समर्पित रहा, उनके नेतृत्व में चला यह आंदोलन, संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन सरकार के शासनकाल में हुए 2जी, राष्ट्रमंडल खेल, कोयला घोटाले जैसे करोड़ों रुपये के घोटालों एवं भ्रष्टाचार के खिलाफ था। ‘सत्यमेव जयते’हमारा राष्ट्रीय घोष है। पर इसे हर बार अग्नि का स्नान करना पड़ा है और पड़ेगा। सत्य कब जीतेगा और सत्ता कब जीतेगी? यह कोई नहीं जान पाया। पर यह निश्चित है कि असत्य कभी नहीं जीतता। अन्ना के मंच से बड़े-बड़े दावे करने वाले  केजरीवाल और उनकी पार्टी की आज इन सभी मूल्यों के प्रति कोई आस्था नहीं है।

नगर निगम में चुनाव में मिली करारी शिकस्त, लगातार हार और ईवीएम पर ब्लेम की राजनीति करने के बाद अब केजरीवाल अपने पार्टी कार्यकर्ताओं या आमजन के सामने किस मुंह से आए? हो सकता है कि ईवीएम के साथ कुछ समस्याएं हों, किन्तु आप की दिल्ली, पंजाब और गोवा में हार के लिए इन मशीनों को दोषी ठहराना कायराना अन्दाज है। सत्तारूढ़ बीजेपी ने ईवीएम मशीन से छेड़छाड़ की है तो फिर पंजाब में उसको सत्ता से क्यों बाहर होना पड़ा? पार्टी ने खुद ही अपनी यह दुर्गति की है और इसके लिए पूरी तरह के केजरीवाल ही जिम्मेदार हैं और यह जिम्मेदारी उन्ही स्वीकारनी चाहिए। भारतीय राजनीति के वे एक ऐसे काले अध्याय के रूप में याद किये जाएंगे, जिन्होंने सिद्धान्तों की बजाय अवसरवादिता को प्राथमिकता दी। प्रधानमंत्री की कुर्सी के लालच में वे अच्छे मुख्यमंत्री एवं राजनेता नहीं बन पाए। चले थे बाघ बनने लेकिन वे बघेला बन कर रह गये। मैथिलीशरण गुप्त की प्रसिद्ध कविता की पंक्ति ‘हम क्या थे, क्या हो गए, क्या होंगे अभी…..।’ हम तो बाघ थे बघेले कैसे हो गए? बघेला ‘क्रॉसब्रीड’का ही उत्पाद है, जो जंगल से बस्ती में आकर उत्पात मचाता है। पर ये संबोधन जब मनुष्य के आगे लग जाता है तब वह अपनी बस्ती से बाहर जाकर उत्पात मचाता है। परन्तु दहशत दोनों ही पैदा कर देते हैं। ये बात अलग है कि बघेला सम्मान प्राप्त नहीं करता क्योंकि ऐसे बघेले बाघों के नहीं बिल्लियों के ही सरदार बनते हैं। एक बार जब कोई बघेला बन गया तो वह कई बघेलाओं का जन्मदाता हो जाता है। बघेला बनना न्यूसेन्स की कीमत को अपनाना होता है। जो केजरीवाल ने कर दिखाया है। न्यूसेन्स में अगर कोई आधार नहीं होता, कोई तथ्य नहीं होता, कोई सच्चाई नहीं होती तो दूसरों के लिए खोदे गए खड्डों में स्वयं एक दिन गिर जाने की स्थिति बन जाती है। अब यह प्रश्न अलग चर्चा का है कि केजरीवाल ने खुद अपने लिये खड्डा खोदा है या दूसरों के खोदे खड्डों में गिरना उनकी विवशता बनी? लेकिन दोनों ही स्थितियों के लिये जिम्मेदार तो केजरीवाल ही माने जाएंगे।

केजरीवाल के बघेला बनने से समाचार का शीर्षक तो बना, लेकिन कोई स्वर्णिम इतिहास नहीं बन पाया। क्योंकि इतिहास सदैव हिम्मत और कुर्बानी से बनता है। बघेले, बघेले ही रहते हैं, वे बाघ नहीं बन सकते। इसका प्रमाण है कि मुख्यमंत्री बनने के तत्काल बाद उन्होंने लुटियन जोन में दिल्ली के लोगों से मिलने के लिए बंगला मांगा जिसमें एक दर्जन से अधिक एसी लगे थे। बाद में उनके घर के बाहर धरना-प्रदर्शन होने लगे तो मुख्यमंत्री ने उन पर प्रतिबंध लगा दिया। इस तरह से धरने-प्रदर्शन से राजनीति की शुरुआत करने वाले केजरीवाल सत्ता में आते ही धरने के खिलाफ हो गए। हर मोर्चें पर विकास की जगह विनाश की राजनीति करने वाले केजरीवाल का राजनीतिक जीवन अब अंधकारमय है। राजनीति में यदि वे जिन्दा रहना चाहते हैं तो उन्हें अपनी सोच बदलनी होगी। सेवा को, विकास को एवं गुड गवर्नेंस को माध्यम बनाना होगा, आत्म-निरीक्षण करना होगा। मिल-जुलकर कार्य करने का पाठ सीखना होगा। विरोध की राजनीति का त्यागना होगा। स्वयं एक जिम्मेदार संवैधानिक पद पर होते हुए भी संविधान के विभिन्न स्तंभों से निरंतर टकराने की उनकी प्रवृत्ति एवं मानसिकता उनके और उनकी पार्टी के पतन का कारण बनी है। जनता इतनी भी मूर्ख नहीं है कि दिल्ली को दिन-ब-दिन तबाही एवं बर्बादी को ओर जाते हुए देखती रहे और उसके शासक के बड़बोले बयानों में झूठ और फरेब को सुनती रहे। ‘मुफ्त’और ‘सस्ते’के लोकलुभावन वादों की सचाई लम्बे समय तक नहीं छुपी रह सकती। असल में केजरीवाल की विचारधाराविहीन राजनीति, उनकी महत्वाकांक्षाएं, अराजक कार्यशैली और नकारात्मक एवं झूठ की राजनीति के कारण आप को अल्पकाल में ही इतिहास के पन्नों में सिमटने को तैयार होना पड़ रहा है।

 

ललित गर्ग

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