क्या अन्नाद्रमुक का वजूद बचेगा?

क्या अन्नाद्रमुक का वजूद बचेगा?

अन्नाद्रमुक के निर्विवाद नेता एमजीआर और जयललिता आज पार्टी की दुर्दशा से अपनी समाधि में जरूर करवटें बदल रहे होंगे। आखिर उन्होंने अन्नाद्रमुक को बुलंदी पर पहुंचाया था। पार्टी की यह दुर्दशा 2016 में लगातार दूसरी बार विधानसभा चुनावों में भारी विजय के फौरन बाद ही शुरू हो गई।

पूर्व मुख्यमंत्री जे. जयललिता 22 सितंबर 2016 को जब अपोलो अस्पताल में भर्ती की गईं, उसके बाद से ही तमिलनाडु में राजकाज ठप हो गया। अलबत्ता उनकी मृत्यु के बाद कुछ दिनों तक जरूर ओ. पनीरसेल्वम ने राजकाज ठीक से चलाया।

अस्पताल में जयललिता के दाखिल होते ही शशिकला वहां की कमान संभाल रहीं थी। केंद्र की भाजपा सरकार राज्यपाल विद्यासागर राव के जरिए दखलंदाजी भी चतुराई से दे रही थी। अपोलो अस्पताल में जयललिता का कुशल-क्षेम पूछने गए राज्यपाल ने वहां से लौटते ही पनीरसेल्वम को बुलाकर उनसे जयललिता के मंत्रालयों का कार्यभार देखने को भी कहा। इस तरह पनीरसेल्वम वस्तुत: मुख्यमंत्री बन गए। वे शुरू से ही केंद्र के साथ दोस्ती बनाए रहे, जैसा कि ‘उदय योजना’ में शामिल होने और खाद्य सुरक्षा योजना को लागू करने से पता चलता है। हालांकि अस्पताल में शशिकला को पूरी छूट दी गई लेकिन केंद्र ने चतुराई से उन्हें राजकाज से दूर रखा और जयललिता की मृत्यु के बाद पनीरसेल्वम को मुख्यमंत्री बनावा दिया गया।

खासकर जल्लीकट्टू उत्सव की वापसी, प्रदर्शनकारियों पर काबू पाने में कामयाबी और वाधरा तूफान के वक्त तेजी से राहत कार्य के बाद पनीरसेल्वम की छवि बेहतर मुख्यमंत्री के रूप में उभरने लगी तो शशिकला ने पार्टी पर नियंत्रण के लिए तेजी से कदम बढ़ाए। वफादार मंत्रियों और विधायकों की मदद से खुद को पार्टी का महासचिव बनवा लिया, हालांकि वह भी पार्टी के नियम-कायदों के मुताबिक नहीं हुआ।

फिर, जब शशिकला सरकार पर भी नियंत्रण कायम करने के लिए पनीरसेल्वम को बड़ी बेअदबी से मुख्यमंत्री के पद से हटने को कहा तो पनीरसेल्वम ने जयललिता की समाधि के किनारे लगभग 45 मिनट तक ध्यान लगाकर बैठने के बाद शशिकला और उनके परिवार के खिलाफ खुली बगावत छेड़कर मास्टरस्ट्रोक चल दिया। इस मास्टरस्ट्रोक ने उन्हें रातोरात मजबूत छवि वाला नेता बना दिया। राज्य भर में लोग उनके समर्थन में जुटने लगे और जयललिता की मृत्यु पर शशिकला और उनके परिवार के प्रति नाराजगी खुलकर प्रकट होने लगी।

हालांकि पनीरसेल्वम की खुशी थोड़े समय ही रही। शशिकला ने पार्टी के 123 विधायकों के साथ तख्तापलट कर दिया। पनीरसेल्वम इस मामले में निपट अकेले पड़ गए।

हालांकि शशिकला की मुख्यमंत्री बनने की आकांक्षा पर आय से अधिक संपत्ति के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले की तलवार लटक रही थी। सुप्रीम कोर्ट साफ कर चुका था कि कभी भी फैसला आ सकता है। राज्यपाल विद्यासागर राव ने सदन में विश्वास मत के लिए समय तय करने में विवेकाधिकार का प्रयोग किया।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद शशिकला के पास अपने किसी वफादार को मुख्यमंत्री बनाने के अलावा कोई चारा नहीं बचा था। उन्होंने इडापड्डी पलानीस्वामी को चुना।  लेकिन उन पर अंकुश रखने के लिए शशिकला ने अपने भतीजे टीटीवी दिनकरण को पार्टी का उपमहासचिव बना दिया। इस बीच पनीरसेल्वम ने चुनाव आयोग में अर्जी दी कि शशिकला के महासचिव बनने की प्रक्रिया की जांच की जाए। उससे दिनकरण का उपमहासचिव बनने की प्रक्रिया भी संदेह के दायरे में आ गई।

दिवंगत जयललिता के क्षेत्र आरके नगर में उपचुनाव की घोषणा हुई तो दिनकरण ने वहां से उम्मीदवारी का पर्चा भरा। पार्टी में टूट के कारण चुनाव आयोग ने अन्नाद्रमुक का दो पत्तों वाला चुनाव चिन्ह जब्त कर दिया तो पनीरसेल्वम खेमा  अन्नाद्रमुक पुराचितलैवि अम्मा बन गया। दिनकरण खेमा अन्नाद्रमुक अम्मा बन गया। दोनों को नए चुनाव चिन्ह मिले।

चुनाव में द्रमुक ने एक नौसिखुए को खड़ा किया, जिसे पनीरसेल्वम खेमे से गुपचुप समझौता माना गया। भाजपा ने संगीतकार इलैयराजा के भाई गंगै अमरन को खड़ा किया और कम्युनिस्टों का भी एक उम्मीदवार मैदान में था। भारी प्रचार शुरू हुआ और हमेशा की तरह पैसा बांटने का दौर भी शुरू हुआ। दिनकरण ने हर वोटर को 4,000 रु. के हिसाब से बांटना शुरू किया। दूसरी पार्टियों ने शिकायत की तो चुनावा आयोग हरकत में आया।

आयकर विभाग ने स्वास्थ्य मंत्री विजयभास्कर के घर, दफ्तर और कारोबारी भवनों पर छापा मारा और करोड़ों रुपए और वोटरों में पैसा बांटने से संबंधित कागजात जब्त किए। समतुवा मक्कल काचि (समता लोक पार्टी) के अध्यक्ष, अभिनेता सरतकुमार के घर वगैरह पर भी छापा मारा गया, जिन्होंने एक दिन पहले ही दिनकरण को समर्थन का ऐलान किया था। इसके बाद चुनाव आयोग ने आरके नगर उपचुनाव को रद्द कर दिया।

स्वास्थ्य मंत्री पर आयकर के छापों ने दूसरे मंत्रियों की पेशानी पर भी बल डाल दिया। शशिकला खेमे को भारी झटका इससे भी लगा कि दिल्ली पुलिस ने दिनकरण के खिलाफ एक दलाल सुकेश चंद्रशेखर के जरिए चुनाव आयोग के अधिकारियों को घूस देने की कोशिश का मामला दर्ज कर लिया। सुकेश के घर से पैसे और कागजात बरामद हुए।

दिनकरण की गिरफ्तारी तय देखकर पार्टी के वरिष्ठ नेता और मंत्री अचानक शशिकला, दिनकरण और मन्नारगुडी परिवार के खिलाफ उठ खड़े हुए। पनीरसेल्वम खेमे को संदेश भेजा गया कि मन्नारगुडी परिवार को हटाकर पार्टी को फिर से एक कर लिया जाए, ताकि दो पत्तियों वाला चुनाव चिन्ह फिर हासिल हो जाए।

पनीरसेल्वम खेमे ने दो शर्तों के साथ संदेश का स्वागत किया। एक, मन्नारगुडी परिवार को पार्टी से पूरी तरह निकाल बाहर किया जाए और दूसरे, पूर्व मुख्यमंत्र जयललिता की मृत्यु की जांच के लिए न्यायिक आयोग बैठाया जाए। इन शर्तों को पलानीस्वामी धड़े ने मान लिया और विलय की बातचीत होने लगी। पार्टी पदाधिकारियों की नाराजगी देखकर दिनकरण ने कहा कि वे पहले ही पार्टी की गतिविधियों से दूर हैं। सिर्फ आठ विधायक दिनकरण के समर्थन में आगे आए।

पनीरसेल्वम की छवि इससे और बेहतर हुई है क्योंकि उन्होंने ही पहले शशिकला के खिलाफ बगावत का झंडा बुलंद किया था।

विपक्षी पार्टी द्रमुक इस पर नजर जमाए हुए हैं। उसे उम्मीद है कि पलानीस्वामी की सरकार अपने ही अंतरविरोधों से गिर जाएगी। द्रमुक के कार्यकारी अध्यक्ष स्टालिन सभी विपक्षी दलों से तालमेल बनाए हुए हैं। फिलहाल कांग्रेस, वीसीके, आइयूएमएल और टीएमएमके द्रमुक के साथ हैं।

विजयकांत की बीमारी की वजह से डीएमडीके की जमीन खिसक रही है। वायको के 2009 में गिरफ्तारी के बाद से एमडीएमके की चमक भी फीकी पड़ रही है। इन दोनों के फीके पडऩे से लोक कल्याण मोर्चा बेमानी हो गया है, जो पिछले विधानसभा चुनावों में बना था। इसका हिस्सा रही कम्युनिस्ट पार्टियां अब द्रमुक के साथ हैं।

जहां तक भाजपा का मामला है, उसका काम हो गया है। सूत्रों के मुताबिक वह अविभाजित अन्नाद्रमुक के पक्ष में है जिससे मन्नारगुडी परिवार बाहर हो जाए। तमिलनाडु में 134 विधायकों और 38 सांसदों के साथ अन्नाद्रमुक का राज 2019 के लोकसभा चुनावों के पहले तक बेहतर है। पहले तो राष्ट्रपति चुनावों में ही उसका समर्थन हासिल होगा। राज्यसभा में अन्नाद्रमुक का समर्थन भाजपा के लिए मददगार होगा। अगले चुनाव अन्नाद्रमुक के साथ मिलकर लडऩा भाजपा की जमीन तैयार करने के लिए अच्छा रहेगा।

दिल्ली पुलिस ने दिनकरण के साथ पूछताछ की और उन्हें गिरफ्तार कर लिया है। पार्टी की गतिविधियों से अपने को दूर करने का उनका बयान भी रणनीतिक लगता है। अगर वे गिरफ्तार नहीं होते तो वे पूरी बदले की भावना से पार्टी पर कब्जा जमाने की कोशिश कर सकते थे।

मगर दुर्भाग्य से मन्नारगुडी माफिया की सूत्रधार शशिकला के पति नटराजन भी बीमार बताए जाते हैं। वे अस्पताल में भर्ती हैं। अगर उनकी सेहत बिगड़ती है और दिनकरण की गिरफ्तारी के बाद तो मन्नारगुडी माफिया की जमीन वाकई खिसक गई है।

अगर अन्नाद्रमुक में विलय की बातचीत आगे नहीं बढ़ी तो दोफाड़ होगा और सरकार गिर जाएगी। तब पार्टी बचेगी या डूबेगी, यह इसी पर निर्भर करता है कि पनीरसेल्वम और पलानीस्वामी खेमे मिलकर एक हो जाते हैं या नहीं।

अगर सरकार गिर जाती है तो द्रमुक सरकार बनाने की कोशिश कर सकती है। हालांकि द्रमुक की दिक्कत भी यही है कि करुणानिधि की तबीयत खराब है। अगर वे लडख़ड़ा जाते हैं तो द्रमुक में स्टालिन और अलगिरी धड़ों के बीच बंट सकती है।

इस तरह तमिलनाडु की राजनीति ऐसे मोड़ पर है कि सभी विपक्षी दल सोच रहे हैं कि भाजपा अन्नाद्रमुक की आपसी लड़ाई से फायदा उठाने की कोशिश कर रही है। सो, सभी सक्रिय हो गए हैं। दिल्ली के जंतर-मंतर पर किसानों का अजीबोगरीब धरना भी इसी का हिस्सा है। द्रमुक और स्टालिन ने किसानों की मांग को लेकर प्रदेश में बंद का भी आयोजन किया और प्रदर्शन भी जारी है।

लेकिन सच्चाई यह भी है कि राज्य में एक बड़ा राजनैतिक शून्य पैदा हो रहा है, जो भाजपा के लिए दैवीय मौके की तरह है। यहां भाजपा इसलिए भी कामयाब हो सकती है क्योंकि कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियों जैसे राष्ट्रीय दलों का कोई आधार नहीं बचा है। तमिलनाडु के लोग भी भाजपा को बदलाव के साथ स्वागत कर सकते हैं। राज्य में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से काफी लोगों को उम्मीदें हैं।

चेन्नई से बी.आर. हरन

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