नवीन बाबू का उत्थान और पतन

नवीन बाबू का उत्थान और पतन

ओडीशा फिर सुर्खियों में है और इस बार पंचायत और जिला परिषद के चुनाव के नतीजे उसे खबरों में लाए हैं। पिछले करीब साढ़े सत्रह साल से ओडीशा में बीजू जनता दल (बीजद) सत्ता में है और कांग्रेस मुख्य विपक्षी दल है लेकिन इस बार आश्चर्यजनक रूप से भाजपा ने अनोखा चुनावी प्रदर्शन दर्ज किया है। जिला परिषद चुनावों में भाजपा 2012 में 36 सीटों से छलांग लगाकर इस बार 297 पर पहुंच गई है जबकि बीजद 2012 में 651 सीटों से लुढ़ककर इस बार 473 पर आ गिरी है। कांग्रेस तो राज्य की कुल 849 सीटों में से महज 60 सीटें जीतकर राजनैतिक रूप से अप्रासंगिक होने के कगार पर पहुंच गई है। इन स्थानीय निकाय चुनावों के नतीजों ने ओडीशा में राजनैतिक पंडितों को यह कहने पर मजबूर किया कि भाजपा अब डूबती कांग्रेस और अलोकप्रिय होते सत्तारूढ़ बीजद की जगह लेने लगी है। बेशक, राष्ट्रीय मंच की तरह ही मोदी का करिश्मा ओडीशा के ग्रामीण इलाकों खासकर पश्चिमी ओडीशा में जमीन पर असर दिखाने लगा है। अब ओडीशा में नरेंद्र मोदी का नाम भाजपा के पक्ष में राजनैतिक माहौल बनाने में जादू बिखेरने लगा है, जो 2014 के लोकसभा चुनावों में नहीं दिखा था।

स्थानीय चुनावों में भाजपा की जीत की वजहों पर काफी चर्चा हो चुकी है। यहां तक कि राष्ट्रीय मीडिया भी इससे ओडीशा की राजनीति पर चर्चा करने को मजबूर हुआ है। बीजद के गठन की शुरुआत से ही नवीन बाबू अपनी विराट शख्सियत के बल पर अकेले दम पर सब कुछ चला रहे हैं। यह अलग बात है कि लगातार तीन चुनाव जीतने के बाद भी नवीन बाबू अभी ओडिया नहीं बोल पाते। लेकिन उनका करिश्मा ऐसा है कि 2014 के लोकसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी की रैलियों में भारी भीड़ जुटने के बावजूद बीजद ने कुल 21 संसदीय सीटों में से 20 जीत ली। केंद्र में सरकार बनने के बाद मोदी सरकार के कई मंत्रियों ने नवीन बाबू के प्रयासों से राज्य के विकास की सराहना की। कृषि में प्रगति की केंद्र ने सराहना की। हाल के स्थानीय निकाय चुनावों के पहले तक भाजपा के नेता कभी राज्य सरकार या नवीन बाबू पर सीधे हमले नहीं बोलते थे। नवीन बाबू पर तीखी बोली बोलने वाले इकलौते केंद्रीय आदिवासी मामलों के मंत्री जुएल ओराम रहे हैं, जो खदान और चिटफंड घोटालों में कई बार राज्य सरकार के खिलाफ सीबीआइ जांच की मांग कर चुके हैं।

पश्चिम बंगाल के ज्योति बाबू की तरह ओडीशा में नवीन बाबू ने चुनाव दर चुनाव जीते हैं और आजादी के बाद ओडीशा की राजनीति में सबसे ताकतवर साबित हुए हैं। वे बीजद के भीतर और बाहर अपने सभी आलोचकों को खत्म करने में कामयाब रहे हैं। उनकी सरकार ने हर उम्र वर्ग के लोगों के लिए खैरात की योजनाएं शुरू की, जिससे वे शहरी और ग्रामीण इलाकों में खासे लोकप्रिय होते गए। लेकिन गौरतलब यह है कि कोई उनकी रणनीति नहीं भांप पाया है, पार्टी में कोई भी उनका करीबी होने का दावा नहीं कर सकता। तीसरी बार के मुख्यमंत्री नवीन बाबू की अगुआई में राज्य गहरे संकट और नीतिगत पंगुता से गुजर रहा है। विकास का कोई एजेंडा नहीं दिखता। सबसे अहम यह है कि ओडीशा में एक भी उद्योग नहीं लग पाया है, पास्को परियोजना के ठप्प होने से एफडीआइ का सबसे बड़ा स्रोत तो बंद ही पड़ा है। सरकार की खैरात योजनाओं से कृषि क्षेत्र को गंभीर चुनौती झेलनी पड़ रही है। इसलिए राज्य से कुशल और अकुशल मजदूरों का पलायन बड़े पैमाने पर हो रहा है। बीपीएल सूची, प्रधानमंत्री आवास योजना, इंदिरा आवास जैसी तमाम योजनाओं में भारी घोटाला हो रहा है।

दूसरी ओर विपक्षी कांग्रेस का राज्य में सक्षम नेतृत्व के अभाव में बुरा हाल है। राज्य भाजपा जमीनी स्तर पर खास संगठन न होने और कुछ ही प्रभावी नेताओं के कारण नवीन बाबू को टक्कर देने की हालत में नहीं रही है। लेकिन अब यह कहा जा सकता है कि भाजपा नवीन बाबू को गद्दी से उतारने की ताकत बटोरने लगी है। कांग्रेस तो अंदरूनी कलह और गुटबंदी से तबाह होने की कगार पर है। भाजपा के लिए अनेक मुद्दों और घोटालों में नवीन सरकार का भंडाफोड़ करने का मौका है। लेकिन ओडीशा के विकास के लिए राजनैतिक ईच्छाशक्ति की भी दरकार है। राज्य पिछले छह दशकों से विकास की पटरी से पूरी तरह उतर चुका है। अटकलों पर यकीन करें तो नवीन बाबू बीमार हैं और वाकई बहुत अधिक इधर-उधर आ-जा नहीं सकते, जैसा कि हाल के पंचायत चुनावों के प्रचार में उनकी लगभग गैर-मौजूदगी से देखने को भी मिला। अगर यह सही है तो नवीन पटनायक सरकार की उलटी गिनती शुरू हो गई है, जो 2019 के विधानसभा चुनावों में खत्म हो जाएगी।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

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