परम पुरुष और परमात्मा

परम पुरुष और परमात्मा

कहा जाता है कि जीवन एक रंगमंच है। यहां हर कोई एक कलाकार है। हममें से हर किसी को एक किरदार निभाना पड़ता है। इस रंगमंच का एक ही निर्देशक है, वह है परमात्मा, उन्हीं के इशारों से यहां कलाकारों को अपनी कला का प्रदर्शन करना पड़ता है। बस विशेष बात यह है कि यहां निर्देशक सामने खड़े रहकर उंगली के माध्यम से निर्देशन नहीं देते हैं। हमें जो करना है वह उनके द्वारा पहले से ही निर्धारित होता है। कलाकारों को बस अपना अभिनय करना पड़ता है। इस रंगमच पर अपना अभिनय दिखाना ही एक व्यक्ति की जीवनशैली हो सकती है। यहां पर जो इंसान पूरे जीवन को अच्छी तरह से समझ लेते हैं, वही अच्छे कलाकार साबित होते हैं। अपने जीवन को सुंदर बनाने के लिए जीने की कला सबको आनी चाहिए।

देखा जाए तो जीवन इतना जटिल नहीं है, जितना हम समझते हैं या दूसरों को समझाने की कोशिश करते हैं। जीवन को बस जीने लगें तो वह आनंददायक हो सकता है। जीवन अगर जटिल लगता है तो वह केवल हमारे कारण, हम अपने स्वभाव के कारण अपने चारों तरफ एक ऐसा जाल बुन लेते हैं कि हम चाहकर भी आसानी से उससे छुटकारा नहीं पा सकते हैं। इसके अंदर रहकर एक अजीब-सी घुटन में रहते हैं। हम एक बार सोच लें कि इस दुनिया में आते वक्त हमारे पास क्या था और जाते वक्त हम अपने साथ क्या लेक र जाएंगे। सच को हमें हर क्षण महसूस करना जरूरी है। अपने जीवन के सफर को आसान बनाने के लिए हम एक सहायक बना लेते हैं। हम जिसको अपना सहायक बनाते हैं, वह हमारे हर मुश्किल समय में हमारे साथ खड़ा रहता हैं और उसके बदले में हमें भी उसके लिए उतना ही करना पड़ता है। जब उसे पाने और करने के गणित को समझने में गलती हो जाती है तब हम दूसरों से नाराज होकर खुद को दुखी कर बैठते हैं। इनमें से कोई जड़ तो कोई सजीव होते हैं, जिन्हें हम अपना मानते हैं। हम एक बार किसी को या कोई भी चीज को अपना मानते हैं तो उससे दूर होना हमारे लिए मुश्किल हो जाता है। हम अपना पूरा मालिकाना हक उसके ऊपर हावी करने की कोशिश करते हैं। किसी दूसरे की दाखलअंदाजी बिलकुल भी मंजूर नहीं होती है। हमारे चाहने से तो सब कुछ नहीं घट जाता, जब उसमें व्यतिक्रम दिखता है तो हम दुखी हो जाते हैं।

दुनिया में घटने वाली हर अनहोनी के माध्यम से हमारे निर्देशक हमें ज्ञान देना चाहते हैं। यहां पर हर कोई क्षण भंगुर है। कभी भी हमें उन सभी चीजों से जिसे हम अपना मानते हैं, उससे दूर होना होगा। जो जीवन की इस जीने की कला को समझ लेते हैं, वे आसानी से जीवन जी लेते हैं। हमारे आस-पास घटने वाले हर कार्य हमारे ज्ञान के लिए घटता है, जैसे अच्छा विद्यार्थी अपने गुरु से किए गए हर कार्य को गौर से ध्यान करता है और कार्य में लगता है। केवल अध्ययन से हम उतना ज्ञान प्राप्त नहीं कर पाएंगे, जब तक हम उस कार्य में नहीं लग पाते हैं। जीने की कला यह है कि हम जिस प्रकार दूसरों के साथ रहते हैं उसी प्रकार ही हमारे लिए वह सभी हो जाते हैं। देखा जाए तो हमारे जीवन का सुख और दुख हमारे ऊपर निर्भर करता है।

उपाली अपराजिता रथ

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