आज के युग में दोस्तों की कमी नहीं

आज के युग में दोस्तों की कमी नहीं

पुरानी कहावत है कि दोस्त वह जो वक्त पर काम आये। लोग यह भी कहते हैं कि अच्छा दोस्त मुश्किल से, किस्मत से ही मिलता है। पर यह तो बात पुरानी हो गयी। अब तो जमाना है फिल्मों का, टीवी का, इन्टरनेट का, मोबाइल फोन का, फेसबुक का, वट्सअप का, इंस्टाग्राम का, सेल्फी का। अब तो व्यक्ति को दोस्त मिल जाते हैं सरेआम राह चलते, सड़क पर, चौराहे पर, चलती बस में, बस अड्डे पर, रेलवे प्लेटफार्म पर, रेल के डिब्बे में। आप ने किसी से हाथ मिला लिया, इसका मतलब है कि आपने दोस्ती का हाथ बढ़ाया, उसने भी बढ़ाया, हाथ मिला और दोस्ती हो गई। अब दोस्त बनाना उतना ही आसान हो गया है जितना कि पुराने जमाने में मुश्किल था। तब दोस्त मिलते ही कहां थे? मिल भी जाये तो कोई जल्दी से न तो दोस्त बनाता ही था और न कहता था क्योंकि सब समझते थे कि दोस्त कहना तो आसान है पर दोस्ती निभाना बड़ा मुश्किल होता है। पर अब तो यह काम बड़ा आसान है।

अब तो आप फेसबुक पर अपना अकाउंट खोलिये। अपना परिचय लिखिये। परिचय में अपने बारे कुछ भी लिख देने में आप संविधान में प्रदत्त अभिव्यक्ति की पूरी स्वतन्त्रता का पूरा उपयोग कर सकते हैं। जमीन के नीचे से आसमान की ऊंचाइयों तक अपनी कल्पना की उड़ान को छू सकते हैं। आप अपने बारे जो भी दावा करेंगे आपके फेसबुक मित्रों के लिये पत्थर पर लकीर है। कोई आपसे सर्टिफिकेट नहीं मांगेगा और न देखने आयेगा। कुछ को दोस्त बनने का निमन्त्रण भेज दीजिये। साधारणतय: तो आपका अनुरोध स्वीकार ही हो जायेगा। फेसबुक पर आपकी फोटो आकर्षक होनी चाहिये किसी फिल्मी हीरो-हीरोइन से कम नहीं। यही तो मार्केटिंग है। आप तो जानते ही हैं कि सब की नजऱ पहले पैकिंग पर ही होती है, माल तो कैसा है वह तो पैकिंग खुलने पर ही पता चलता है। पैकिंग ठीक नहीं होगी तो व्यक्ति उस माल पर नजऱ भी नहीं डालता। इसलिये इस पर ध्यान देना अति आवश्यक है।

वर्तमान की वास्तविकता यह है कि आज कोई व्यक्ति किसी दूसरे की प्रशंसा करने को राजी ही नहीं है। लोग एक-दूसरे की बुराई करने में ही विश्वास रखते हैं। आजकल के इंटरनेट माध्यमों ने व्यक्ति को अपने आप को आंकने और प्रशंसा करने का एक माध्यम प्रस्तुत किया है। कई ईर्षालु इसे आत्मप्रशंसा की संज्ञा भी दे देते हैं। पर यदि पराये किसी का सही आंकलन न करें और उसकी तारीफ न करें तो क्या व्यक्ति को अपनी सही तस्वीर प्रस्तुत करने से वंचित रखा जाना चाहिये?

गिने-चुने दोस्तों को कह दीजिये कि जो आपने अपनी पोस्ट पर लिखा है वह उसे लाइक और शेयर कर दें। आपको धड़ाधड़ आग्रह आने लगेंगे कि उन्हें अपना दोस्त बना लीजिये। वह अपना प्रोफाईल व अपनी फोटों भी साथ भेजते हैं। इससे आपको दोस्त बनाने में आसानी रहती है। इसमें महिलायें भी होती हैं और पुरूष भी। चुनाव आपको करना है।

एक समय सब से कठिन काम था पुरूषों के लिये गर्लफ्रेंड और महिलाओं के लिये बॉयफ्रेंड बनाना। किसी राह चलती लड़की को तो आप पूछ नहीं सकते थे कि तुम मेरी गर्लफ्रेंड  बनोगी। हर समय खतरा रहता था कि वह कहीं चप्पल ही न उठा ले और सरेबाजार और मोहल्ले में आपकी बेइज्जती हो जाये। महिलायें चाहते हुये भी किसी पुरूष को बायॅफ्रेंड बनाने का आग्रह करने से झिझकती थीं। फिर यह भी डर रहता था कि कहीं उनके पिता या पति को पता न चल जाये। पर अब इसका खतरा नहीं रहता क्योंकि फेसबुक अकाऊंट पूरी तरह सीक्रेट रहता है। उसकी गोपनीयता की चाबी सदैव आपके पास रहती है। आजकल सभी एक-दूसरे की प्राईवेसी का सम्मान करते हैं। यह उदार भावना तो हम भारतीयों में आ ही गई है भला हो पश्च्मिी  सभ्यता का जिसने सदियों पुरानी रूढि़वादिता के शाप से हमें मुक्त करवा दिया है। अब तो पति-पत्नी, संतान-माता-पिता, भाई-बहन और दोस्त-दोस्त के बीच भी प्राईवेसी की एक ऐसी दीवार खड़ी रहती है कि कोई उसे लांघना नहीं चाहता, उसे तोडऩा नहीं चाहता। सब उसकी रक्षा करता चाहते हैं। उसका सम्मान करना सीख गये हैं।

जब कोई आपकी पोस्ट को लाइक और शेयर करता है तो आपका भी कर्तव्य बनता है कि इस भाईचारे को निभायें और उनकी भी हर पोस्ट पर लाईक की मोहर लगा दें। इस प्रकार आपकी स्वीकार्यता और लोकप्रियता हजारों और लाखों तक पहुंच सकती है।

पारम्परिक दोस्ती में चिट्ठी-पत्री का झंझट रहता है। फिर आजकल तो पत्र लिखने का रिवाज ही नहीं रहा। लोगों को तो अपने दोस्त-मित्रों को, अपने माता-पिता को, रिश्तेदारों को पत्र लिखना ही भूल गया है। सच्ची बात तो यह है कि अब तो पत्र लिखने की कला ही हमारी सांस्कृतिक धरोहर बनने जा रही है। अब तो होती है ईमेल, ऐसऐमऐस, वर्डसऐप से। कागज-पैन-पैंसिल को तो काम ही नहीं रहा। इससे ऊपर आप मोबाईल और इन्टरनैट से चैटिंग भी कर सकते हैं। जो दोस्ती की डोर इन माध्यमों से बढ़ती है वह किसी और से नहीं।

पिछली कुछ सदियों में कभी लेखनी मित्र (पैन फ्रेंड्स)  का भी बोलबाला रहा। पर अब तो यह बीसवीं और उससे पहले की सदियों का इतिहास बन कर रह गया है।

पर इस सदी में दोस्त बनाने में कोई परेशानी नहीं है। आपको सैर करते समय, राह चलते, किसी कार्यालय में किसी मन्त्री या अफसर को मिलने में प्रतीक्षा करते समय, कहीं नौकरी के लिये साक्षात्कार देते समय या किसी प्रतियोगिता में भाग लेते समय व्यक्ति को कई लोग मिल जाते हैं। आजकल तो वह सब मित्र ही माने और कहलाये जाते हैं। कहीं कोई आपको मिल जाये तो अपना परिचय देना और दूसरे का परिचय प्राप्त करना आजकल एक सहज बात है। अपना विजि़टिंग कार्ड उसे थमा दीजिये, औपचारिकता में दूसरा भी आपको अपना विजिटिंग कार्ड दे ही देगा। और नहीं तो अपना मोबाईल नम्बर तो दे ही देगा। बस हो गई दोस्ती।

आजकल तो आलम यह भी है कि आपने किसी बड़े व्यक्ति से हाथ मिला लिया तो फोटो खिंचवा लीजिये। आजकल तो बहुत आसान है। किसी को अपना माबाईल थमा दीजिये। नहीं तो आजकल सैल्फी ही खींच लीजिये। लगा दीजिये अपने फेसबुक पेज पर। फोटो के नीचे परिचय और विवरण तो आपकी लेखन प्रतिभा पर निर्भर करता है। आप जो करिश्मा दिखा पायेंगे, वही आपकी कमाई है। आपके दोस्त जान जायेंगे कि आम कितने बड़े हैं, आपकी कितनी पहुंच है। वह गर्व करने लगेंगे कि उनका  दोस्त इतना महान है।

यदि आप किसी कार्यक्रम में एक आम दर्शक-श्रोता के रूप में भी जायें तो इसे अपने दोस्तों के लिये महान् अवसर बना सकते हैं कि वह सब आप से ईर्षा करने लगें कि उस कार्यक्रम में जाने का निमन्त्रण प्राप्त करने का सौभाग्य वह स्वयं क्यों नहीं  प्राप्त कर सके?

अब तो बॉयफे्रंड और गर्लफ्रेंड फेसबुक के माध्यम से ही मिल जाते हैं। बात कई बार बढ़ती बढ़ती बढ़ जाती है। कई बार तो चैटिंग और बात मिलने तक पर पहुंच जाती है। जब दुनिया की नजऱ पड़ जाती है तो तो फिल्म वालों की तरह कहा जाता है कि यह केवल दोस्ती और दोस्ती है। उससे बढ़ कर कुछ नहीं। और फिल्मी स्टाइल में कई बार तो दोस्ती शादी तक पहुंच जाती है। पर सदा हैपी एंडिंग ही नही होती। कई बार तो यह दोस्ती धोखा भी खा जाती है। ब्लात्कार के मामले भी सामने आये हैं।

पर भाई यह आधुनिक युग है। दोस्ती भी आज के युग की होती है। इक्कीसवीं सदी में अठारहवीं सदी की दकियानूसी अपनी छाती से लिपटाये रखना पिछड़ेपन की निशानी है। आज तो बड़े दिल और उदारवादी होने का ज़माना है।

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