राहुल बाबा जिन्दाबाद कांग्रेस चाहे हो बर्बाद

राहुल बाबा जिन्दाबाद कांग्रेस चाहे हो बर्बाद

जैसे ही राहुल गांधी राजनीति में आए कांग्रेस नेताओं ने पार्टी को तिलांजलि देते हुए राहुल गांधी जिन्दाबाद जपना शुरू कर दिया था। वैसे भी कांग्रेस में पार्टी से अधिक पार्टी अध्यक्ष और विशेष तौर से नेहरू परिवार को महत्व दिया जाता रहा है। यहां तक कि सोनिया गांधी जैसी नौसिखिया नेता भी पार्टी पर हावी रही हैं। उनकी सफलता का राज था कि वे सभी वरिष्ठ नेताओं जैसे अर्जुन सिंह, प्रणव मुखर्जी, गुलाम नवी आजाद, जनार्दन द्विवेदी आदि को अलग से बुलाकर परामर्श लेकर निर्णय लेती थीं। अर्जुन सिंह की हां के लिए अजीत जोगी और भूपेन्द्र सिंह हूडा को मुख्यमंत्री की घोषणा किये जाने के लिए इन्तजार करती रहीं।

राहुल गांधी के राजनीति में क्रियाशील होते ही उन्होंने वरिष्ठ नेताओं को लाईन में लगाना चालू कर दिया जबकि उनके पिता राजीव गांधी भी वरिष्ठ नेताओं को बोलने का अवसर देते थे। खुद अपने प्रस्ताव उन्होंने नारायण दत्त तिवारी और अर्जुन सिंह के कहने पर कई बार वापस लिये।

राहुल गांधी ने दिग्विजय सिंह को अपने नजदीक रखा और कार्यालय तथा पूरे गोपनीय कार्यों के लिए स्वर्गीय आईएफ.एस अधिकारी एस.के. सिंह, जिन्हें राजस्थान का राज्यपाल भी बनाया गया, के बेटे कनिष्क को भार दे दिया। उनकी मात्र योग्यता यह थी कि वे राहुल गांधी के सखा थे। उनका महत्व इससे ही जाना जा सकता है कि एस.के. सिंह की अंत्येस्टि में लोधी रोड श्मशान स्थल पर सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी सभी उपस्थित रहे। मैं स्वयं वहां था और उन्हें अंत तक खड़े देखा।

कनिष्क और दिग्विजय दोनों ठाकुरों ने मिलकर राहुल गांधी को अपने घेरे में जकड़ लिया। सबसे पहला काम कांग्रेसी कद्दावर नेता अर्जुन सिंह को महज ठाकुर होने के कारण उखाडऩे का किया गया। उन्हें मनमोहन सिंह की दूसरी सरकार में मंत्री तक नहीं बनाया गया। राहुल गांधी राजनीति के दांव-पेंच जाने बगैर दिग्विजय के चंगुल मे फंसते चले गये। राहुल जिन्दाबाद कर करके उन्हें वाहवाही का नशा चढ़ा दिया। बस यहीं से जिन्दाबाद की परिपाटी शुरू हुई और पार्टी की बर्बादी शुरू हो गई।

पहली बार ऐसा हुआ है कि राहुल गांधी हों बर्बाद का नारा लगा और वो भी नेहरू परिवार में विश्वस्नीय स्थान प्राप्त करने वाली दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित से। पार्टी के उपाध्यक्ष वरिष्ठ सांसद और राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी के बेटे, नेहरू परिवार के राजनैतिक वारिस राहुल गांधी को अपरिपक्व यानी अधपका नेता कहकर शीला ने ”राहुल गांधी हों बर्बाद’’ का नारा लगा दिया है। ये वही शीला दीक्षित हैं जो उत्तर प्रदेश से सांसद का चुनाव हारीं, फिर दिल्ली लाई गईं, यहां भी सांसद का चुनाव हारीं पर प्रदेश कांग्रेस की अध्यक्ष बनी रहीं। सोनिया की पसंद होने के कारण फिर उन्हें चुनाव लड़ाया गया और वे दिल्ली की मुख्यमंत्री बनीं और 15 वर्ष तक बेरोक-टोक दिल्ली में राज करती रहीं।

शीला का महत्व और कद इससे आंका जा सकता है कि अनिल शास्त्री सारे प्रयासों और अर्जुन सिंह के पूरे आशीर्वाद के बावजूद भी दिल्ली से लोकसभा का टिकट नहीं पा सके। तत्कालीन विधायक बरखा सिंह का टिकट कट जाने के बावजूद भी अर्जुन सिंह की बेटी बीना सिंह दिल्ली से टिकट नहीं पा सकीं। दोनों जगहों पर शीला की ही चली।

बाद में शीला के पुत्र संदीप दीक्षित, जिनका राजनैतिक कद मात्र यह था कि मुख्यमंत्री के पुत्र थे, को टिकट मिला और वे सांसद और पार्टी के प्रवक्ता भी बने। शीला जी को दिल्ली हारने पर उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री का दावेदार बनाकर वर्तमान विधानसभा चुनाव में आगे किया, बाद में उन्हें वहां से हटा लिया गया। उन्हें हटाने में राज्यसभा सदस्य प्रमोद तिवारी और पार्टी के कोषाध्यक्ष मोतीलाल वोरा की भूमिका रही। प्रमोद तिवारी तीस बर्षों से अधिक समय तक विधायक रहे। वे राज्यसभा सदस्य समाजवादी पार्टी के सरप्लस वोटों से बने। सपा से उनकी सांठगांठ, इसी से पता चलती है कि उन्हीं को राज्यसभा प्रत्याशी बनाये जाने पर सपा ने वोटों की सहमति दी थी।

प्रमोद तिवारी को रीता बहुगुणा जोशी का बढ़ता कद अखर रहा था। वे किनारे लगी ही थीं कि शीला दीक्षित आ गईं और वे ब्राह्मण नेताओं में पीछे खिसकने लगे। राहुल गांधी फिर एक बार मोतीलाल बोरा और प्रमोद तिवारी के चक्रव्यूह में फंस गए। ये वही वोरा हैं जो नेशनल हेराल्ड कांड में पार्टी की किरकिरी करा चुके हैं और सबको एफ.आईआर की नौबत तक पहुंचा चुके हैं। वरिष्ठ नेताओं से राहुल गांधी ने सलाह-मशविरा लेना बंद कर दिया। डॉ. करण सिंह स्वभाव से पंगा लेने वाले व्यक्ति नहीं हैं। मोहसिना किदवई कभी एहसानफरामोश नहीं रहीं और चुप बैठ गईं। जनार्दन द्विवेदी की आदत अर्जुन सिंह की तरह भीष्म पितामह जैसी इन्द्रप्रस्थ के सिंहासन की वफादारी से बंधी है।

शीला को अपना ध्वस्त होता राजनैतिक कद और बेटे संदीप का अंधेरे में डूबता भविष्य दिखाई दिया तो उन्होंने राहुल गांधी को अधपका नेता कहकर उनके नेतृत्व पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया। इससे राहुल का राजनैतिक कद एकाएक बौना हो गया। समाजवादी पार्टी से समझौता कर उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव के पिछलग्गू बनकर जो उनकी साख गिरी तो उसमें शीला के इस नारे ने और बट्टा लगा दिया। इसके दूरगामी परिणाम होंगे और कांग्रेस का बिखराव निश्चित है।

जगह-जगह कांग्रेस की पराजय पहले ही राहुल गांधी के नेतृत्व पर सवालिया निशान लगा रही है। सोनिया गांधी का दाहिना हाथ कही जाने वालीं शीला दीक्षित की बगावत हासिये पर डाले गये अन्य कांग्रेसी नेताओं को आवाज देने का कार्य कर सकती है।

दिल्ली में जे.पी. अग्रवाल, हरियाणा में भूपेन्द्र सिंह हुड्डा, मध्य प्रदेश में अर्जुन सिंह के बेटे अजय सिंह राहुल, उत्तर प्रदेश में मोहसिना किदवई और एआईसीसी मुख्यालय में जनार्दन द्विवेदी को गुलाम नबी आजाद जैसी कला तो आती नहीं जो इंदिरा गांधी, नरसिंह राव, राजीव गांधी, सोनिया गांधी और अब राहुल के भी चहेते बने हुए हैं। दिग्विजय और मोतीलाल वोरा की बेमेल जोड़ी ने अर्जुन सिंह जैसे वफादार को भी ठिकाने लगाया था और अब अजीत जोगी को कांग्रेस छोडऩे पर मजबूर कर दिया। दोनों नेताओं के लिए न ”कांग्रेस जिन्दाबाद न राहुल गांधी जिन्दाबाद बस अपने विरोधी मुर्दाबाद’’ की मुहिम ही सब कुछ है।

डॉ. विजय खैरा

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