धरतीपुत्र का नारा महाराष्ट्र में शिव सेना करे तो पाप, यूपी में प्रियंका-राहुल-कांग्रेस करें तो पुण्य

धरतीपुत्र का नारा  महाराष्ट्र में शिव सेना करे तो पाप, यूपी में प्रियंका-राहुल-कांग्रेस करें तो पुण्य

क्या उत्तर प्रदेश को किसी बाहरी व्यक्ति को अपना पुत्र गोद लेने की आवश्यकता है? क्या उत्तर प्रदेश के पास अपने युवा नहीं हैं जिनमें प्रदेश का विकास करने की क्षमता हो?

ये प्रश्न श्रीमति प्रियंका गांधी वाडरा ने 17 फरवरी  को अपनी माता श्रीमति सोनिया गांधी के  संसदीय चुनाव क्षेत्र में रायबरेली के महाराजगंज में एक चुनावी रैली को संबोधित करते हुए  उठायी। श्रीमति प्रियंका प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के उस वक्तव्यय पर सवाल उठा रहीं थीं जिसमें उन्होंने लखनऊ में अपनी एक रैली में दावा किया था कि उत्तर प्रदेश ने उन्हें गोद में ले लिया है और यह उनका कर्तव्य बन गया है कि वह एक बेटे की तरह प्रदेश का विकास कर उसकी सेवा करें।

श्रीमति प्रियंका ने आगे दावा किया कि उनके भाई राहुल व प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ही यूपी के वास्तविक धरतीपुत्र हैं। उनके दिल व जीवन में यूपी पनप रहा है। यूपी को किसी बाहरी की आवश्यकता नहीं है। यहां के युवा यूपी का विकास करने में सक्षम हैं।

ऐसे ही उद्गार उनके भाई व कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी व यूपी के समाजवादी पार्टी मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने व्यक्त किये। उनके इस कथन ने तो शिव सेना प्रमुख स्वर्गीय बाल ठाकरे व वर्तमान में महाराष्ट्र निर्माण सेना प्रमुख राज ठाकरे के धरतीपुत्र के सिद्धान्त को ही पुनर्जीवित कर रख दिया है — उस सिद्धान्त को जिसका पं. जवाहरलाल नेहरू से लेकर इन्दिारा गांधी, राजीव गांधी व सोनिया गांधी तक ने सिरे से खारिज कर दिया था। इसको एक समय तो राहुल गांधी भी नकार चुके हैं। अन्य राष्ट्रीय दल भी इसकी भर्तस्ना कर चुके हैं। समाजवादी पार्टी भी इसमें पीछे नहीं रही है।

भारत का संविधान जाति, पंथ, लिंग, व क्षेत्र के आधार पर किसी प्रकार के भेदभाव की इजाजत नहीं देता। लगभग सभी दल एकमत हैं कि धरतीपुत्र की अवधारणा देश की भावनात्मक एकता के लिये बहुत बड़ा खतरा है। इसके कारण तो देश का ही बिखराव हो सकता है। हमारे उच्चतम न्यायालय तक ने इसकी भरपूर अनखेदी की है।

भारत का हर नागरिक देश के हर कोने में एक है, एक समान है। उसे दूसरे प्रदेश में भी वही अधिकार प्राप्त हैं जो वहां उत्पन्न नागरिक को हैं। कोई व्यक्ति वह चाहे किसी भी प्रदेश में जन्मा हो, उसे किसी दूसरे प्रदेश में रहने-बसने, व्यापार या नौकरी करने व वहां का मतदाता बनकर चुनाव लडऩे व मतदान करने का उतना ही अधिकार है जितना कि वहां जन्मे-पले को। इस अधिकार को कोई नहीं छीन सकता वह चाहे कोई भी—राहुल-अखिलेश तो क्या, उनसे भी बड़ा कोई नहीं।

इसका मतलब तो यह निकला कि कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, राहुल-प्रियंका-अखिलेश ने वही सिद्धान्त यूपी में भी अपना लिया है जो शिव सेना, बाल ठाकरे, उद्धव-राज ठाकरे ने महाराष्ट्र में अपनाया है और जिसका कांग्रेस वहां डट कर विरोध करती है।

गांधी परिवार कितना खरा

प्रश्न यह भी उठता है कि प्रियंका-राहुल की ‘यूपी के सच्चे धरतीपुत्र’ की अवधारणा पर वह स्वयं और उनका परिवार कितना खरा उतरा है? उनमें से कोई भी यूपी की धरती पर तो पैदा हुआ ही नहीं। श्रीमति सोनिया गांधी तो पैदा ही इटली में हुई और वहां ही उनका लालन-पोषण हुआ। वह तो भारत की नागरिक भी राजीव गांधी के साथ विवाह के लगभग 10-12 साल बाद बनी थीं।

राहुल के पिता राजीव गांधी व दादी इन्दिरा गांधी दिल्ली  (यूपी नहीं) में पैदा हुये थे और यहीं पढ़े-बड़े हुये। यही कहानी राहुल और प्रियंका की है। राहुल दून (तब यूपी, अब उत्तराखण्ड में) स्कूल में अवश्य  पढ़े थे। पर इससे वह राहुल-प्रियंका परिभाषा के ‘सच्चे धरतीपुत्र’ नहीं बन जाते। दून स्कू्ल में तो अब तक देश-विदेश व अन्य प्रदेशों के हजारों-लाखों बच्चे पढ़ चुके हैं। वह प्रियंका परिभाषा के यूपी के ‘सच्चे धरतीपुत्र’ तो नहीं हो सकते। उनके दादा फिरोज गांधी बंबई, अब मुम्बई, में पैदा हुये थे।

उनका यूपी की धरती पर दावा केवल इस बात पर है कि उनकी दादी के पिता जवाहरलाल नेहरू इलाहाबाद में पैदा हुये थे। दूसरा दावा उनका इस बात पर है कि फूलपुर, अमेठी व रायबरेली के संसदीय चुनाव क्षेत्र का प्रतिनिधित्व उनके पिता, दादा व दादी कर चुके हैं। मतदाता किसी व्यक्ति को किसी चुनाव क्षेत्र से अपना प्रतिनिधि तो चुन सकते हैं पर वह क्षेत्र निर्वाचित व्यक्ति की पैतृक सम्पत्ति नहीं बन जाती जिसपर उनके उत्तराधिकारी अपना कानूनी हक जताएं।

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चुनावी पर्यटक

निर्वाचित प्रतिनिधियों की स्थिति तो चुनावी पर्यटकों से अधिक कुछ नहीं जो चुनाव के मौसम में आते हैं, चुनाव-प्रचार करते हैं और जीतने/हारने के बाद दिल्ली में अपनी आरामगाहों में सज बैठते हैं।

2014 के आम चुनाव में केन्द्रीय मंत्री श्रीमति स्मृति ईरानी ने अमेठी से राहुल गांधी के विरूद्ध चुनाव लड़ा था पर विजयी न रहीं। फिर भी वह अमेठी चुनाव क्षेत्र में विजयी सांसद राहुल गांधी से अधिक प्रवास करती हैं। जनता की समस्याएं सुनती हैं और सुलझाती हैं।

प्रियंका और राहुल ने ‘बाहरी’ और ‘सच्चे धरतीपुत्र’ का विवाद खड़ा कर तो अपनी दादी और माता को भी नीचे दिखाने का प्रयास किया है। पता नहीं उन्हें याद है कि नहीं, उनकी माता श्रीमति सोनिया गांधी ने 1999 में कर्नाटक में बिल्लासरी से लोक सभा चुनाव लड़ीं व जीती थी। उनकी परिभाषा के अनुसार यदि वह यूपी की ‘सच्ची ‘ धरतीपुत्री थीं तो उन्होंने किस नैतिक आधार पर कर्नाटक से चुनाव लड़ा था? उनके ही मानदण्ड के अनुसार तो वह ‘बाहरी’ थीं। इसी प्रकार एक बार उनकी दादी श्रीमति इन्दिरा गांधी ने भी कर्नाटक में चिकमगलूर व मेडक से चुनाव लड़ा था। वह भी फिर उतना ही गलत था।

तात्पर्य यह है कि चुनाव मूल्यों और नीतियों के आधार पर नहीं, चुनावी तुक्कों और जुमलों पर लड़ा जा रहा है। जो बात एक गांव में ठीक है उसे ही वह दूसरे गांव में नकार रहे हैं। यूपी में सच्चे धरतीपुत्र का नारा उन्हे पुण्य लग रहा है और दूसरों द्वारा इसी नारे को महाराष्ट्र में लगाये जाने पर पाप बता रहे हैं। धन्य हैं यह नेता।

अम्बा चरण वशिष्ठ

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