ओडीशा में बीजद के दिन लदे

ओडीशा में बीजद के दिन लदे

पंचायत चुनावों का तो यही संदेश : कांग्रेस साफ, बीजद कमजोर, और भाजपा का जोर बढ़

ओडीशा के स्थानीय निकाय चुनावों में भाजपा की अप्रत्याशित चुनावी जीत ने राज्य में सियासी समीकरणों को अचानक बदल दिया है। भाजपा देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस को विस्थापित करके राज्य में दूसरी अहम राजनैतिक ताकत बन गई है। सिर्फ यही नहीं, सत्रह साल में पहली दफा भाजपा ने नवीन पटनायक की अगुआई वाली बीजद और उसकी सरकार को गंभीर चुनौती पेश की है। लगातार चौथी बार मुख्यमंत्री नवीन को हाल में संपन्न त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों में जैसी चुनावी पराजय का सामना कभी नहीं करना पड़ा था। हालांकि बीजद ने जिला परिषदों में अधिकतम सीटें जीतकर अपनी नंबर 1 की हैसियत बनाए रखी है मगर 2012 के पंचायत चुनावों के मुकाबले उसने 180 से ज्यादा सीटें गंवा दी हैं। इन चुनावों के रुझाान से साफ है कि सत्तारूढ़ बीजद का असर घटने लगा है। राज्य के तटीय इलाकों के अलावा नवीन पटनायक की बीजद को पश्चिम, दक्षिण और उत्तर ओडीशा के जिलों में भारी झटका झेलना पड़ा। इस बार बीजद 30 में से 16 जिला परिषदों में काबिज हो पाई है (2012 में वह 28 जिला परिषदों में काबिज थी)। भाजपा को 8 जिला परिषद में बहुमत मिला है (पहले उसके पास एक भी नहीं था) और कांग्रेस को सिर्फ 1 जिला परिषद ही जीत पाई (2012 में उसके पास दो जिला परिषदें थीं) लेकिन वह दो अन्य जिला परिषद में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है।

ताजा आंकड़ों के मुताबिक 849 (कुल 853) सीटों में से बीजद को ४७३ सीटें, भाजपा को २९७, कांग्रेस को ६० औॅर अन्य को 16 सीटें मिली हैं। अन्य में निर्दलीय के अलावा भाकपा, माकपा और झामुमो शामिल हैं। 2012 में बीजद को 651 सीटें, कांग्रेस को 128 सीटें और भाजपा को सिर्फ 36 सीटें मिली थीं।

दिलचस्प यह है कि भाजपा ने अपनी संख्या आठ गुना बढ़ा ली है जबकि बीजद ने 180 सीटें गंवाई है और कांग्रेस आधी सीटें हार गई है। कांग्रेस तो राज्य के कुल 30 जिलों में 15 में खाता भी नहीं खोल पाई।

इस बार 853 जिला परिषद सदस्यों, 6801 पंचायत समिति सदस्यों, 6802 सरपंचों और 92029 वार्ड सदस्यों के लिए चुनाव हुए। पचास प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित थीं। आबादी के आधार पर महिला, ओबीसी, एसटी और एससी के लिए पद आरक्षित थे। 5वीं अनुसूची के इलाकों में मुख्य पद एसटी के लिए आरक्षित थे।

बीजद के पूर्व नेता तथा पूर्व वित्त राज्यमंत्री पंचानन कानूनगो ने कहा, ”इस बार की तरह हिंसक झड़पें और धनबल तथा बाहुबल का इस्तेमाल कभी  नहीं देखा गया था।’’ उन्होंने यह भी कहा, ”पंचायत चुनाव राजनैतिक पार्टियों के लिए कई वजहों से अहम होता जा रहा है। पंचायत चुनावों में जीते सदस्य ही विधायकों, सांसदों के लिए जमीनी स्तर पर मुख्य आधार होते हैं। दूसरे राज्य और केंद्र सरकार की मनरेगा जैसी योजनाओं से अधिक से अधिक धन ग्रामीण इलाकों में पहुंच रहा है।’’

ओडीशा के पंचायत चुनावों में भाजपा ने बीजद और कांग्रेस दोनों को भारी झटका दिया है। भाजपा ने राज्य में अपने इस उभार को उत्तर प्रदेश के वोटरों को प्रभावित करने में इस्तेमाल किया। राज्य में भाजपा ने विजय उत्सव मनाया और 2019 के विधानसभा और लोकसभा चुनावों की तैयारी के लिए पार्टी संगठन को मजबूत करने का फैसला किया। दूसरी ओर बीजद अपनी छोटी जीत को काफी बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रही है। बीजद और भाजपा की टकराहट भी कड़वाहट की हद तक बढ़ गई है। 24 फरवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश की रैली में ओडीशा में गरीबी, बेरोजगारी और भुखमरी से मौतों के लिए नवीन सरकार को आड़े हाथों लिया। राजधानी दिल्ली में केंद्रीय मंत्रियों जुएल ओरांम और राज्य भाजपा प्रभारी अरुण सिंह के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस में धर्मेंद्र प्रधान ने ओडीशा सरकार को जन विरोधी नीतियों के लिए आड़े हाथें लिया।

भुवनेश्वर में बीजद मुख्यालय में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में दो कनिष्ठ मंत्रियों संजय देसवर्मा और अरुण साहू ने  सांसद पिनाकी मिश्रा के साथ भाजपा के आरोपों का खंडन किया और दावा किया कि बीजद अभी भी नंबर 1 पार्टी है। राज्य के लोगों ने नवीन पटनायक सरकार पर भरोसा जताया है। देसवर्मा ने कहा, ”इस छोटी जीत से भाजपा अगर राज्य में 2019 में सरकार बनाने का सपना देख रही है तो यह उसका दिवास्वप्न ही है।’’

2000 से 2009 तक बीजद की सहयोगी रही भाजपा से 2009 में नवीन पटनायक ने रिश्ते तोड़ लिए थे। उन्होंने उसे कंधमाल सांप्रदायिक दंगों के लिए दोषी करार दिया था। भाजपा तभी से हर जिले में अपनी मौजूदगी जताने की कोशिश में लगी है। भाजपा तभी से नवीन सरकार की हर मोर्चे पर आलोचना करती आ रही है। लेकिन भाजपा के कार्यकर्ताओं में 2014 लोकसभा चुनावों में केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार बनने से जोश बढ़ा।

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वर्ष 2016 में प्रधानमंत्री ने साल भर में तीन बार राज्य का दौरा किया और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह दो वर्ष में दो बार वहां पहुंचे। इसके अलावा केंद्रीय पंट्रोलियम और प्राकृतिक गैस राज्यमंत्री धर्मेंद्र प्रधान के लगातार राज्य में दौरों से भी पार्टी कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ा। इसके अलावा लोकसभा में महज सुंदरगढ़ की इकलौती सीट जीतने के बावजूद जूएल ओरांव को केंद्रीय आदिवासी मामलों का मंत्री बनाया। धर्मेंद्र प्रधान भले राज्य से न जीते हों और बिहार से राज्यसभा सदस्य हों पर वे काफी सक्रिय रहते हैं। इन सबसे भाजपा को काफी प्रश्रय मिला है।

हालांकि 2015 में अमित शाह का बहुप्रचारित दौरा खास असर नहीं पैदा कर पाया था क्योंकि उन्होंने नवीन पटनायक पी तीखा हमला नहीं किया था जबकि राज्य में पार्टी पटनायक सरकार की चिटफंड घोटाले में शिरकत के लिए हो-हल्ला मचा रही थी। लेकिन पिछले साल 25 नवंबर को अपने दूसरे दौरे में उन्होंने भ्रष्ट नवीन सरकार के खिलाफ पार्टी कार्यकर्ताओं में जोश भरा।

दिलचस्प यह भी है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ओडीशा के पंचायतों चुनावों की जीत को उत्तर प्रदेश के कन्नौज और गोंडा की सभाओं में मुद्दा बनाया। हालांकि गोडा की सभा गरीबी और भुखमरी के उनके वर्णन से नया विवाद खड़ा हो गया। उन्होंने कहा, ”देश का सबसे गरीब राज्य ओडीशा बेरोजगारी, गरीबी और भुखमरी से मौतों के लिए जाना जाता है लेकिन अब ओडीशा की जनता भाजपा के साथ जुड़ रही है, उन्होंने हममें भरोसा जताया है।’’

मोदी के इस बयान पर राज्य में भारी प्रतिक्रिया हुई। बीजद और कांग्रेस दोनों ने विधानसभा और उसके बाहर तीखी प्रतिक्रिया की और मोदी से राज्य के लोगों का अपमान करने के लिए माफी मांगने को कहा। बीजद विधायकों ने महात्मा गांधी की मूर्ति के आगे धरना भी दिया। हालांकि भाजपा ने मोदी के बयान का समर्थन किया और पूछा कि क्या नागदा गांव में कुपोषण से और मलकानगिरी में जापानी बुखार से बच्चों की मौत नहीं हो रही है? क्या दाना मांझी कालाहांडी में एंबुलेंस न मिलने से अपनी पत्नी के शव को कंधे पर ढोकर ले जाने को मजबूर नहीं हुए? क्या यह राज्य का अपमान नहीं है कि 17 साल से शासन कर रहे मुख्यमंत्री राज्य की सरकारी भाठीक से बोल नहीं पाते?

भाजपा की जीत का श्रेय राज्य में धर्मेंद्र प्रधान के लगातार दौरों, मोदी की नोटबंदी और बीजद सरकार की नाकामियों को दिया जा रहा है। भाजपा के मुख्य प्रवक्ता सज्जन शर्मा ने कहा, ”यह जीत हमारे दो-ढाई साल के लगातार परिश्रम और केंद्र में मोदी सरकार की जन हितैषी नीतियों और नवीन सरकार की नाकामियों को उजागर करने का नतीजा है।’’

दूसरी तरफ बीजद का दावा है कि उसका वोट प्रतिशत बरकरार है। उसने पिछले चुनावों में 42 प्रतिशत सीटों के साथ 60 प्रतिशत सीटें जीती थीं। बकौल एक बीजद नेता, कांग्रेस पिछली बार 29 प्रतिशत वोट पाई थी, इस बार उसने 15 प्रतिशत वोट भाजपा के हाथों गंवा दिया।

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बीजद के उपाध्यक्ष सूर्य नारायण पात्रा ने उदय इंडिया से कहा कि कांग्रेस के परंपरागत वोट के हस्तांतरण से भाजपा की सीटें बढ़ी हैं और उसका वोट प्रतिशत भी 29 से बढ़कर 35 हुआ है। पात्रा ने कहा कि भाजपा संबलपुर, बोलांगीर, बरगढ़, कालाहांडी, मलकानगिरी और मयूरभंज में दूसरे स्थान पर है और जीत का अंतर पिछले लोकसभा चुनावों से काफी कम है। 2009 के चुनावों में ये सभसी कांग्रेस के गढ़ हुआ करते थे। इसलिए भाजपा के जश्न की कोई वजह नहीं है। उन्होंने कहा, ” न नवीन पटनायक की छवि को झटका लगा है, न नरेंद्र मोदी की छवि लोकप्रिय हुई है, यह तात्कालिक झटका है और हम कुछ समय में अपने संगठन को मजबूत कर लेंगे। कोई चिंता की बात नहीं है।’’

कांग्रेस के नेताओं ने माना कि इस हार की वजह राज्य नेतृत्व की नाकामी और पार्टी आलाकमान में अनिश्चय की स्थिति है। वरिष्ठ कांग्रेस नेता और पूर्व मंत्री गनेश्वर बेहेरा ने कहा, ”कमजोर संगठन, लगातार बढ़ती गुटबंदी और पैसों की कमी से भारी पराजय देखने को मिली है। अगर आलाकमान सही फैसले ले और पुरानी गलतियों से सबक ले तो संगठन में जासन फूंकी जा सकती है।’’

Layout 1राजनैतिक जानकारों के मुताबिक यह चुनाव सत्तारूढ़ बीजद के लिए परीक्षा की तरह थे। इसमें कुल 3 करोड़ों वोटरों में से करीब 2.6 करोड़ वोटर हिस्सा ले रहे थे इसलिए ये 2019 के विधानसभा और लोकसभा चुनावों के सेमीफाइनल की तरह थे।

दरअसल हजारों करोड़ के चिटफंड घोटाले में मुख्यमंत्री कार्यालय की कथित भूमिका, बीजद के सांसदों-विधायकों-नेताओं और अफसरशाहों की कथित भागीदारी से करीब दो करोड़ लोगों को चपत लगने का आरोप मुद्दा बना। इसके अलावा हजारों करोड़ के खनन घोटाले, सरकारी जमीन पर अमीरों का कब्जा करोड़ों रुपए का दाल घेटाला वगैरह की जांच चल रही है। यही नहीं, किसानों की आत्महत्या, महिलाओं पर अत्याचार, माओवादी बताकर आदिवासयों की हत्या, राशन कार्ड वितरण में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार, मुख्यमंत्री की सुरक्षा के नाम पर महिलाओं के साथ कथित दुव्र्यवहार, भुवनेश्वर के मेयर के कथित यौनाचार, और राज्य में कानून-व्यवस्था की खराब स्थिति भी बड़े मुद्दे हैं। जानकारों के मुताबिक ये मुद्दे बीजद के खिलाफ गए।

दिलचस्प है कि बीजद ने इस बार ओडिया सिनेमा के सितारों को भी प्रचार में उतारा था। गंजम जिले के एक अखबार के पत्रकार सबर तराई के मुताबिक, ”सितारों ने भीड़ तो काफी जुटाई लेकिन वोट नहीं खींच सके।’’ प्रचार में नवीन पटनायक की गैर-मौजूदगी भी भाजपा के लिए काफी मददगार साबित हुई।

भाजपा की जीत का एक दूसरा पहलू केंद्र के प्रति नवीन पटनायक का अस्पष्ट रवैया है। वे केंद्र को तमाम बातों के लिए दोषी भी मानते हैं लेकिन नोटबंदी का समर्थन भी कर गए। कांग्रेस और भाजपा दोनों ही महानदी मामले पर नवीन पटनायक की आलोचना करते रहे हैं। नवीन प्रचार के दौरान छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह के महानदी घाटी में पानी के अधिकारों पर ओडीशा सरकार पर नाकामी के आरोपों का भी जवाब नहीं दे पाए।

भुवनेश्वर से सुदर्शन छोटराया

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