आर्थिक आजादी में हम फिसड्डी क्यों?

आर्थिक आजादी में हम फिसड्डी क्यों?

देश के कई अर्थशास्त्री मानते हैं कि आजादी के बाद देश को केवल राजनीतिक आजादी मिली मगर आर्थिक आजादी नहीं। लाइसेंस कोटा व्यवस्था के कारण देश में उद्योग धंधों और व्यापार करने पर कई तरह की पाबंदियां लगी हुई थी। 1991 में नरसिंहा राव सरकार द्वारा लाईसेंस कोटा राज खत्म करने के बाद देश आर्थिक आजादी की बयार को अनुभव कर पाया। इसे हमें आर्थिक सुधारों के जरिये ज्यादा कारगर बनाना चाहिए। कुछ आर्थिक सुधार हुए भी मगर हम दुनिया के बाकी देशों से काफी पीछे हैं। आर्थिक आजादी का मतलब होता है देश में उद्योग धंधे, व्यापार व्यवसाय करना सुगम हो। उस पर वेबजह की पाबंदिया न लगाई जाएं। मगर भारत में उद्योग धंधे करना आज भी काफी मुश्किल काम है। यह बात आर्थिक आजादी सूचकांक में झलकती भी है।

वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित आर्थिक आजादी के एक सूचकांक में भारत इस साल पिछड़कर 143वें पायदान पर पहुंच गया है। पिछले साल इस सूचकांक में भारत 123वें पायदान पर था। खास बात यह है कि अमेरिका के एक थिंकटैंक  हैरिटेज फाउंडेशन द्वारा तैयार किए जाने वाले इस सूचकांक में इस साल पाकिस्तान सहित अनेक दक्षिण एशियाई पड़ोसी देश भारत से बेहतर स्थिति में हैं। रपट में  भारत के खराब प्रदर्शन के लिए आर्थिक सुधारों की दिशा का कारण समान रूप से प्रगति न हो पाने को ठहराया गया है।

हेरिटेज फाउंडेशन ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि भले ही पिछले पांच साल में भारत की औसत सालाना विकास दर करीब सात फीसदी रही है, विकास को गहराई पूर्वक नीतियों में जगह नहीं दी गई है, जो आर्थिक आजादी को सीमित करती है। थिंकटैंक ने भारत को ‘अधिकांश रूप से अस्वतंत्र’ अर्थव्यवस्था की श्रेणी में रखा है और कहा है कि बाजारोन्मुख सुधारों की दिशा में प्रगति समान रूप से नहीं हो पा रही है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों के जरिए बहुत से  क्षेत्रों में व्यापक रूप से मौजूदगी बनाए हुए है। रिपोर्ट के मुताबिक प्रतिबंधात्मक और बोझिलकारी रेगुलेटरी माहौल उद्योजकता को हतोत्साहित कर रहा है, जो इसकी जगह निजी क्षेत्र के विकास को बढ़ावा दे सकता था। यही नहीं, भारत को इस सूचकांक में मिले कुल 52.6 अंक गत वर्ष के मुकाबले 3.6 अंक कम हैं, जब भारत 123वें पायदान पर था।

इस साल के आर्थिक आजादी सूचकांक में हांगकांग, सिंगापुर और न्यूजीलैंड अव्वल रहे हैं। दक्षिण एशियाई देशों में सिर्फ अफगानिस्तान 163 पायदान और मालदीव 157 पायदान के साथ भारत के नीचे हैं। 125 पायदान के साथ नेपाल, 112वें पर श्रीलंका, 141 पर पाकिस्तान, 107वें पर भूटान और 128वें पर बांग्लादेश ने आर्थिक आजादी के मामले में भारत को पीछे छोड़ दिया है।

हेरीटेज फाउंडेशन ने कहा है कि भारत का तकनीक और मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर दुनिया में अन्य किसी भी देश के समान विकसित है। वहीं पारंपरिक सेक्टरों की स्थिति अपेक्षाकृत कम विकसित देशों जैसी है। भारत में अकूत संपत्ति और दरिद्रता दोनों समान रूप से विद्यमान हैं। भारत एक ओर तेजी से अपना विकास भी कर रहा है, वहीं, दूसरी ओर अपनी विशाल और विविधतापूर्ण आबादी के लिए समावेशी विकास का रास्ता भी ढूंढ रहा है।

 यह रपट मोदी सरकार के सुधार के दावों पर सवालिया निशान लगाती है। देश के बहुत सारे राजनीतिक पंडित और अर्थशास्त्री चुनाव होने से पहले ही नरेंद्र मोदी के बारे में कह रहे थे कि वे भारत के लिए मार्गरेट थैचर या तेंग सियाओ पिंग साबित हो सकते हैं। इन दोनों नेताओं की खासियत यह थी उन्होंने अपने देशों को समाजवादी मकडज़ाले से मुक्त किया और पूंजीवादी या बाजारोन्मुख विकास के रास्ते पर आगे बढ़ाकर संपन्न बनाया। गुजरात माडल की अद्भुत सफलता के बाद नरेंद्र मोदी से  भी यह उम्मीद की जाने लगी कि वो आर्थिक सुधारों के रास्ते पर चलकर भारत को तरक्की के रास्ते पर ले जाएंगे। लेकिन तीन साल में ज्यादातर उद्योगपति, अर्शशास्त्री निष्कर्ष पर पहुंचे है कि मोदी जितनी कछुआ चाल से आर्थिक सुधार कर रहे हैं उनसे किसी बुनियादी सुधार करने की उम्मीद करना बेकार है। बेशक  भारत ने दुनिया के सबसे तेज विकास दर वाले देश के तौर पर हाल ही आपना मुकाम बनाया है। लेकिन देश में बुनियादी परिवर्तन के मामले में आर्थिक सुधारों की दृष्टि से मोदी सरकार की कोशिशें नाकाफी हैं। तो क्या इस सरकार ने आर्थिक सुधार नहीं किए। यह तो नहीं कहा जा सकता। लेकिन मोदी सरकार ने यह नही जान पाई कि कितने बड़े पैमाने पर सुधार जरूरी हैं। उनकी कोशिश ऐसे फलों को तोडऩे की है जिन तक आसानी से हाथ पहुंच सके।

इकाई के मुख्य कार्यकारी अधिकारी ने कहा ”हां, भारत में व्यवसाय करना कठिन है। मेरे खयाल से विदेशी कंपनियों की यह आम राय है और यह स्थिति सिर्फ दूरसंचार क्षेत्र में ही नहीं है।’’ मगर यह राय केवल विदेशी कंपनियों की ही नहीं है वरन देशी उद्योगपति भी यही शिकायत कर रहे हैं। बजाज ऑटो के प्रबंध निदेशक राजीव बजाज ने देश में नए प्रयोगों को लेकर सरकारी रवैए पर बड़ा करारा व्यंग्य किया. अपनी क्वाड्रिसाइकिल को बाजार में उतारने में आ रही अड़चनों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि देश की रेगुलेटरी संस्थाएं और सरकारी मंजूरी से जुड़ी शर्तें नवाचारों का गला घोटने का काम कर रही हैं. अगर ऐसा ही रहा तो ‘मेड इन इंडिया’ की पहल ‘मैड इन इंडिया’ में बदल जाएगी।

बजाट ऑटो के प्रबंधक निदेशक ने यह भी कहा कि देश में क्वाड्रिसाइकिल की बिक्री शुरू करने के लिए उन्हें पांच साल से इंतजार करना पड़ रहा है, जबकि यूरोपीय, एशियाई और लैटिन अमेरिकी देशों में इस चौपहिया गाड़ी का चलन बढ़ रहा है. उन्होंने इस पर आश्चर्य जताया कि प्रदूषण मुक्त, ईंधन के मामले में किफायती और सुरक्षित होने के बावजूद क्वाड्रिसाइकिल को मंजूरी नहीं दी जा रही। ‘शायद इसलिए मंजूरी नहीं मिल रही कि कुछ लोगों को लगता है कि चार पहिया वाहन खतरनाक होते हैं और लोगों को तीन पहिया वाहनों की सवारी करनी चाहिए। ये दोनों बयान इस बात के सबूत हैं कि भारत में आर्थिक स्वतंत्रता की अब भी बेहद कमी है। यहां नए उद्योग धंधे चलाना अब भी लोहे के चने चबाना है।

पर्याप्त आर्थिक सुधारों का हिमायत करने वाले ये होनों लोग भले ही उद्योगपति हो मगर आर्थिक स्वतंत्रता का उपयोग केवल अमीरों के लिए नहीं  है। इसकी जरूरत उनके लिए ज्यादा है जो समाज के सबसे ज्यादा निम्न आर्थिक वर्ग में गिने जाते हैं। एक गरीब फेरीवाले से बड़ा मुक्त उद्यम का हिमायती कोई हो नहीं सकता। आर्थिक स्वतंत्रता के लिए विभिन्न लाइसेंसों और निरर्थक कानूनों को हटाना भी जुड़ा है जिनके दायरे में लोग जीते हैं। स्वतंत्रता के अभाव और अत्याधिक नियंत्रण से गरीब लोग ही सबसे ज्यादा शिकार बनते हैं। अमीर लोग तो सरकारी नियंत्रण के बावजूद भी अपना रास्ता निकाल लेते हैं जबकि गरीबों के पास आर्थिक स्वतंत्रता के अलावा कोई चारा नहीं हैं।

आर्थिक विकास में नाटकीय वृद्धि लाखों भारतीयों को गरीबी से मध्यम वर्ग की समृद्धि में ले गई इससे भारत की गरीबी की दर में कमी आई। उन्हें आर्थिक उदारवाद का लाभ मिला। दूसरी तरफ बड़ी संख्या में कृषि पर निर्भर भारतीयों को इसका लाभ नहीं मिल पाया क्योंकि कृषि का क्षेत्र सुधारों से अछूता है। वितरण क्षेत्र में छोटे क्रोनीज की भरमार है जो उदारवाद को रोकते हैं जो किसानों और उपभोक्ताओं के बीच बाधा बनकर खड़े हो जाते हैं और दोनों को नुक्सान पहुंचाते हैं। लेकिन किसानों को गंभीर रूप से नुक्सान  पहुंचाते हैं। शहरी क्षेत्रों में आर्थिक उदारवाद के अभाव के कारण अवैध और अनौपचारिक क्षेत्र बरकरार है इस कारण रेहड़ीवाले आदि हाशिये के व्यवसायी कानून का शासन न होने के कारण परेशानी झेलते हैं। वे पुलिस और नौकरशाहों के छापे, ज्यादा निवेश करने और दीर्घकालिक योजना बनाने  में अक्षमता, आदि उनकी जिंदगी को बेहतर बनाने में अन्य बाधाओं का शिकार बनते हैं। आर्धिक उदारवाद को उन तक पहुंचना चाहिए ताकि वे कानून और मार्केट पूंजीवाद का लाभ उठा सकें। जहां आर्थिक स्वतंत्रता ज्यादा होती है वहां भ्रष्टाचार कम होता है। यह पता चलता है कि श्रेष्ठ भ्रष्टाचार विरोधी अभियान केवल बयानबाजी या कठोर दंड़ों पर आधरित नहीं होते वरन् खरीदने और बेचने के आर्थिक एजेंडो को मिलने वाले प्रोत्साहन को कम करने और ऐसे फेवर करने के  अधिकार को खत्म करने पर निर्भर करते हैं।

मोदी समर्थकों और विरोधियों की यह शिकायत रही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में भी कछुआ चाल से ही सुधार हो रहे हैं। वैसे मोदी खुद धड़ाकेदार सुधारों  या बिग बैंग सुधारों विश्वास नहीं करते। इसके बावजूद कई अर्थशास्त्री मानते हैं कि मोदी ने बाकी प्रधानमंत्रियों की तुलना में ज्यादा आर्थिक सुधार किए। जाने माने अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला कहते हैं- मोदी के दो साल के शासन में  पिछले 22 सालों के मुकाबले ज्यादा सुधार हुए हैं।

पिछले वर्षों में हमने भले ही कई आर्थिक सुधार किए हो मगर इस मोर्चे पर बहुत कुछ करना बाकी है। बैंको में बढ़ते एनपीए से स्पष्ट है कि बैंकिंग सेक्टर में सुधारों की सख्त जरूरत है। दरअसल लंबे समय से जिस सुधार की सबसे ज्यादा जरूरत है और कई सरकारें आने के बावजूद वह लटका हुआ है वह है-श्रम सुधार। इसके कारण रोजगार वृद्धि अवरूद्ध हो रही है। मेक इन इंडिया की सफलता के लिए भी यह सुधार बेहद जरूरी है। इसके बगैर हमारी विशाल आबादी हमारी ताकत बनने के बजाय हमारे लिए दुस्वप्न बन जाएगी। लेकिन चाहे कांग्रेस की सरकार हो या मोदी की सरकार दोनों ने तय किया है कि वे श्रम सुधार करंगे तो यूनियनों की सहमति से जो आसानी से इसके लिए तैयार नहीं होगी। सबसे बहले जरूरत है प्रशासनिक सुधारों की। इसके बारे में वीरप्पा मोईली की रपट होने के बावजूद उस पर अमल नहीं किया गया। दरअसल लोगों को तेज गति से सुधारों की उम्मीद थी। जो पूरी नहीं हो पाई है। जब तक ये तमाम आर्थिक सुधार लागू नहीं होते देश आर्थिक आजादी सूचकांक की पायदान पर सबसे नीचे के देशों के साथ रहेगा।

सतीश पेडणेकर

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