नर्मदा परिक्रमा सबसे बड़ा नदी संरक्षण अभियान

नर्मदा परिक्रमा सबसे बड़ा नदी संरक्षण अभियान

जब हम गांव रहते थे तब कभी गंगा नहीं गए थे मगर घर में हर साल गंगा दशहरा मनाया जाता था। छुट्टियों में हर साल मालवा जाते थे वहां एक  और नदी थी जिसकी जयंती मनाई जाती है, वह थी नर्मदा। वहां लोग ‘हर गंगे हर गंगे’ के अलावा ‘नर्मदे हर’ का जयकारा भी लगाते थे। नर्मदा मैया बोलते थे। तब याद आया कि यह वही नर्मदा है जिसका हम नहाते हुए – गंगेच यमुनेचैव गोदावरी सरस्वती नर्मदे सिंधु कावेरी जलअस्मिन संनिधिम् करु -श्लोक कहते हुए स्मरण करते थे। मालवा के पंडितजी ने तब गर्व से बताया था – गंगा की आरती होती है मगर नर्मदा की परिक्रमा की जाती है। दुनिया की एकमात्र नदी है जिसकी परिक्रमा की जाती है। यही नदी है जिसके पत्थर घरों में ठाकुरजी की तरह पूजित होते हैं। पिछले दिनों टीवी पर नर्मदा जयंती के दृश्यों को देखा तो नदी से जुड़ी यादें एक बार फिर ताजा हो गई। कहीं लोग चुनरी चढ़ा रहे थे, कही दूध से अभिषेक हो रहा था, फूलों की मालाएं अर्पित की जा रही थी। कही दीपदान हो रहा था। सभी लोग मध्य प्रदेश की जीवन रेखा मानी जानेवाली नदी के प्रति कृतज्ञता दर्शा रहे थे। मगर तभी मन में विचार कौंधे बिना नहीं रहा कि सांकेतिकता और कर्मकांड में तो हम लोग अव्वल है। हम ऐसे नर्मदा भक्त हैं जो नर्मदा की पूजा तो सुबह शाम करते नहीं थकते मगर नर्मदा बचाओ आंदोलन की आवाज हमें सुनाई नहीं दी। मगर अब मुख्यमंत्री शिवराज चौहान के नेतृत्व में सरकार और जनता नर्मदा सेवा यात्रा के जरिये नर्मदा को बचाने के लिए कमर कसकर उतर पड़ी है। तो नर्मदा संरक्षण का आभियान आंदेलन बनता जा रहा है।

नर्मदा नदी केवल नदी मात्र ही नही आस्था व विश्वास का प्रतीक है, यह मध्य प्रदेश वासियों के लिए जीवनदायिनी नदी है, इसलिए इसका निर्मल एवं अविरल बहते रहना बेहद जरूरी है, इसका संरक्षण किया जाना जरूरी है। नर्मदा नदी का पौराणिक, आध्यात्मिक, सामाजिक एवं आर्थिक महत्व होने के कारण इसके संरक्षण में सरकार के साथ-साथ संत और समाज की भी महत्वपूर्ण भूमिका है।

नर्मदा मध्य प्रदेश और गुजरात में बहने वाली एक प्रमुख नदी है। महाकाल पर्वत के अमरकण्टक शिखर से नर्मदा नदी की उत्पत्ति हुई है। नर्मदा नदी भारत में विंध्याचल और सतपुड़ा पर्वतश्रेणियों के पूर्वी संधिस्थल पर मध्य प्रदेश के अमरकंटक नामक स्थान से निकलती है। यह विंध्याचल और सतपुड़ा के बीचोबीच पश्चिम दिशा की ओर प्रवाहित होती है। उद्गम से लेकर मुहाने तक इसकी कुल लंबाई 1310 किमी. है। यह सागरतल से 3000 फीट की ऊंचाई पर स्थित अमरकंटक  नामक स्थान के एक कुंड से निकलती है। यह कुंड मंदिरों के समूहों से घिरा है। नर्मदा नदी भेड़ाघाट में संगमरमर की चट्टानों के एक कण्ठ के माध्यम से बहती हुई बढ़ती है। इसी स्थान पर आगे ओमकारेश्वर एवं महेश्वर नामक नगर इसके किनारे बसे है। यहां उत्तरी किनारे पर कई मंदिर, महल एवं स्नानघाट बने हुए हैं। इसके बाद यह भरुच पहुंच कर अंत में खंभात की खाड़ी में गिर जाती है। यह मध्य प्रदेश की जीवनरेखा है।

महाभारत और रामायण ग्रंथों में इसे ‘रेवा’ के नाम से पुकारा गया है, अत: यहां के निवासी इसे गंगा से भी पवित्र मानते हैं। नर्मदा, समूचे विश्व में दिव्य व रहस्यमयी नदी है, इसकी महिमा का वर्णन चारों वेदों की व्याख्या में श्री विष्णु के अवतार वेदव्यास जी ने स्कन्द पुराण के रेवाखंड़ में किया है। नर्मदा की इसी ख्याति के कारण यह विश्व की अकेली ऐसी नदी है जिसकी विधिवत परिक्रमा की जाती है। प्रतिदिन नर्मदा का दर्शन करते हुए उसे सदैव अपनी दाहिनी ओर रखते हुए, उसे पार किए बिना दोनों तटों की पदयात्रा को नर्मदा प्रदक्षिणा या परिक्रमा कहा जाता है। यह परिक्रमा अमरकंटक या ओंकारेश्वर से प्रारंभ करके नदी के किनारे-किनारे चलते हुए दोनों तटों की पूरी यात्रा के बाद वहीं पर पूरी की जाती है जहां से प्रारंभ की गई थी।

व्रत और निष्ठापूर्वक की जाने वाली नर्मदा परिक्रमा 3 वर्ष 3 माह और 13 दिन में पूरी करने का विधान है, परन्तु कुछ लोग इसे 108 दिनों में भी पूरी करते हैं। आजकल सड़क मार्ग से वाहन द्वारा काफी कम समय में भी परिक्रमा करने का चलन हो गया है। नर्मदा परिक्रमा के बारे में विस्तार से जानकारी प्राप्त करने के लिए स्वामी मायानन्द चैतन्य कृत नर्मदा पंचांग (1915) श्री दयाशंकर दुबे कृत नर्मदा रहस्य (1934), श्री प्रभुदत्त ब्रह्मचारी कृत नर्मदा दर्शन (1988) तथा स्वामी ओंकारानन्द गिरि कृत श्रीनर्मदा प्रदक्षिणा पठनीय पुस्तकें हैं जिनमें इस परिक्रमा के तौर-तरीकों और परिक्रमा मार्ग का विवरण विस्तार से मिलता है। यद्वपि ये सभी पुस्तकें नर्मदा पर निर्मित बांधों से बने जलाशयों के कारण परिक्रमा पथ के कुछ हिस्सों के बारे में आज केवल ऐतिहासिक महत्व की ही रह गई है, परन्तु फिर भी नर्मदा परिक्रमा के इच्छुक किसी भी व्यक्ति के लिए अवश्य पठनीय है। पर्यावरण मंत्री और नर्मदा समग्र स्वयंसेवी संस्था बनाकर उसके संरक्षण और संवर्धन के लिए लगातार काम करने वाले अनिल माधव दवे द्वारा लिखी गई पुस्तक ‘अमरकण्टक से अमरकण्टक तक’ (2006) भी आज के परिप्रेक्ष्य में अत्यंत प्रासंगिक है।

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नर्मदा की विलक्षणता यह भी है कि वह दक्षिण भारत के पठार की अन्य समस्त प्रमुख नदियों के विपरीत पूर्व से पश्चिम की ओर बहती है नर्मदा का उद्गम मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले (पुराने शहडोल जिले का दक्षिण-पश्चिमी भाग) में स्थित अमरकण्टक के पठार पर एक कुंड में है। यह स्थान सतपुडा तथा विंध्य पर्वतमालाओं को मिलने वाली उत्तर से दक्षिण की ओर फैली मैकल पर्वत श्रेणी में समुद्र तल से 1051 मीटर ऊंचाई पर स्थित है। अपने उद्गम स्थल से उत्तर-पश्चिम दिशा में लगभग 8 किमी. की दूरी पर नर्मदा 25 मीटर ऊंचाई से अचानक नीचे कूद पड़ती है जिससे ऐश्वर्यशाली कपिलधारा प्रपात का निर्माण होता है। इसके बाद लगभग 75 किमी. तक नर्मदा पश्चिम और उत्तर-पश्चिम दिशा में ही बहती है। अपनी इस यात्रा में आसपास के अनेक छोटे नदी-नालों से पानी बटोरते-सहेजते नर्मदा सशक्त होती चलती है।

डिंडोरी तक पहुंचते-पहुंचते नर्मदा से तुरर, सिवनी, मचरार तथा चकरार आदि नदियां मिल जाती हैं। डिंडोरी के बाद पश्चिमी दिशा में बहने का रूझान बनाए हुए भी नर्मदा सर्पाकार बहती है। अपने उद्गम स्थल से 140 किमी. तक बह चुकने के बाद मानों नर्मदा का मूड बदलता है और वह पश्चिम दिशा का प्रवाह छोडकर दक्षिण की ओर मुड जाती है। इसी दौरान एक प्रमुख सहायक नदी बुढनेर का नर्मदा से संगम हो जाता है। दक्षिण दिशा में चलते-चलते नर्मदा को मानों फिर याद आ जाता है कि वह तो पश्चिम दिशा में जाने के लिए घर से निकली थी अत: वह वापस उत्तर दिशा में मुडकर मण्डला नगर को घेरते हुए एक कुण्डली बनाती है। मण्डला में दक्षिण की ओर से आने वाली बंजर नदी इससे मिल जाती है जिससे चिमटे जैसी आकृति का निर्माण होता है। यहां ऐसा लगता है कि नर्मदा बंजर से मिलने के लिए खुद उसकी ओर बढ गई हो और मिलाप के तुरंत बाद वापस अपने पुराने रास्ते पर चल पड़ी हो। इसके बाद नर्मदा मोटे तौर पर उत्तर की ओर बहती है। जबलपुर के पहले नर्मदा पर बरगी बांध बन जाने के बाद यहां विशाल जलाशय का निर्माण हो गया है।

जबलपुर में ही भेंडाघाट में नर्मदा का दूसरा प्रसिद्ध प्रपात धुंआधार पडता है जहां नर्मदा अत्यन्त वेग से 15 मीटर नीचे छलांग मारकर मानों नृत्य करने लगती है। धुंआधार प्रपात के आगे थोडी दूरी पर ही विश्व प्रसिद्ध संगमरमर की चट्टानों के गलियारे से होकर बहती हुई यह नदी प्राकृतिक सौंदर्य की अनुपम छटा बिखेरती है। जबलपुर से आगे चलकर नर्मदा नरसिंहपुर, होशंगाबाद, सीहोर व हरदा जिलों से होकर बहती है जहां शेर, शक्कर, तवा, गंजाल, अजनाल जैसी नदियां इससे जुडती चली जाती हैं। हरदा जिले में स्थित नेमावर को नर्मदा मध्य बिन्दु या नाभिस्थल माना जाता है। हरदा जिले को छोडऩे के बाद नर्मदा पूर्वी निमाड जिले में प्रवेश करती है जहां काफी विरोध, जन आंदोलनों और लंबी कानूनी लडाई के बाद पुनासा में नर्मदा पर बांध बनकर बिजली उत्पादन करने लगा है। अब यहां से आगे बढने के लिए नर्मदा स्वतंत्र नहीं है बल्कि बांध का संचालन करने वाले व्यवस्थापकों और अभियन्ताओं के निर्णय के अनुसार घटती-बढती रहती है।

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नर्मदा परिक्रमा का अपना आनंद और रोमांच है। उसके लिए निबिड जंगलों, दुर्गम पहाडों से होकर कई महीनों गुजरना पड़ता है।  हजारों लोग हर साल यह परिक्रमा करने आते है। ढेरों किताबें लिखी जा चुकी है उसके बारे में। अमृतलाल वेगड ने नर्मदा परिक्रमा पर कई पुस्तकें लिखी हैं। उनके यात्रा संस्मरण सौंदर्य की नदी नर्मदा, अमृतस्य नर्मदा, तीरे-तीरे नर्मदा नर्मदा परिक्रमा के प्रति उनके आकर्षण की मिसाल हैं। नर्मदा उन्हें बार-बार बुलाती रही। उनके संस्मरणों में नदी नदी नहीं रहती, एक जीवंत व्यक्तितव बन जाती है जो हजारों वर्षों से अपने प्रवाह में जीवन को जीवंत बनाती आई है। वे कहते हैं ‘कोई वादक बजाने से पहले देर तक अपने साज का सुर मिलाता है, उसी प्रकार इस जनम में तो हम नर्मदा परिक्रमा का सुर ही मिलाते रहे। परिक्रमा तो अगले जनम से करेंगे।’

नर्मदा के संरक्षण के लिए मध्य प्रदेश सरकार ‘नमामि देवी नर्मदे’ प्रकल्प शुरू किया है। पिछले दिनों संतों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं और पर्यावरणविदों की उपस्थिति नर्मदा के शुद्धिकरण और उसे प्रदूषण मुक्त कराने के लिए नमामि देवी नर्मदा सेवा यात्रा का शुभारंभ  में किया गया। यह सेवा यात्रा 11 दिसंबर से शुरू हुई है 11 मई को इसका समापन होगा। इस यात्रा के शुभारंभ के अवसर पर प्रमुख रूप से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह श्री भैयाजी जोशी, महामंडलेश्वर आचार्य श्री स्वामी अवधेशानंद जी महाराज, परमार्थ निकेतन के स्वामी श्री चिदानंदमुनि जी महाराज, बाबा कल्याण दास, गुजारात के मुख्यमंत्री श्री विजय रूपानी एवं प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान उपस्थित रहे। इस अवसर पर श्री भैयाजी जोशी ने कहा कि भारत की सभ्यता नदियों के किनारे ही विकसित हुई है। धर्म, सभ्यता, व्यापार और यहां तक कि सोच में भी नदियों का महत्वपूर्ण योगदान है। समारोह में उपस्थित प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने सभी का आह्वान करते हुए कहा कि समाज के सभी लोग इस यात्रा का हिस्सा बनें और इस पवित्र मिशन के लाभ लेने के विचार को छोड़कर नर्मदा के शुद्धिकरण के लिए मिलकर कार्य करें। उन्होंने कहा कि नर्मदा के कारण ही प्रदेश कृषि व्यवस्था में अग्रणी बना हुआ है। चार बार वार्षिक पुरस्कार भी इसी के चलते मिला है। यह सब मैया नर्मदा की कृपा से ही संभव हुआ है। गुजरात के मुख्यमंत्री श्री विजय रूपानी ने कहा कि नदी ने राज्य को लाभान्वित किया है। गुजरात इस यात्रा में पूरी तरह से शामिल होगा। गौरतलब है कि नमामि देवी नर्मदा सेवा यात्रा करीब 3500 किमी. क्षेत्र को कवर करेगी।

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नर्मदा नदी के संरक्षण में सरकार की अहम भूमिका है सरकार इस संबंध में नियम व कानून बना सकती है तथा उनका कड़ाई से पालन करवाने हेतु दंड आदि की व्यवस्था कर सकती है। प्रचलित नियमों तथा कानूनों की जानकारी समाज के सभी व्यक्तियों तक पहुंचाने एवं उनका पालन करवाने में समाज एवं स्वैच्छिक संगठनों की अहम भूमिका होती है। नर्मदा नदी का धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व होने के कारण नर्मदा नदी के संरक्षण हेतु लोगों को धार्मिक रूप से जागरूक करने में संतों एवं धार्मिक गुरूओं की भी महत्वपूर्ण भूमिका है।

नर्मदा नदी के संरक्षण में, समाज की भूमिका एवं भागीदारी से तात्पर्य है कि लोग स्वयं नर्मदा नदी के संरक्षण हेतु रणनीति का निर्धारण कर उसका क्रियान्वयन, अनुश्रवण एवं मूल्यांकन आपसी सहयोग से करें, जिससे उनमें अपनत्व एवं उत्तरदायित्व की भावना विकसित हो। नर्मदा नदी के संरक्षण कार्य में समाज की भूमिका सुनिश्चित करने हेतु नदी के किनारों के कस्बों और गांवों में नर्मदा नदी संरक्षण समितियों का गठन किया गया है, जिसमें स्थानीय धार्मिक समूह, सामाजिक-आर्थिक समूह, व्यवसायी, जननेता, शिक्षक, चिकित्सक, स्वास्थ्य सेवक और स्वंयसेवी संस्थाओं व पंचायत और नगर परिषदों आदि के सदस्य सम्मिलित हुए हैं।

‘नमामि देवि नर्मदे’ यात्रा का संचालन 144 दिनों में 50 सदस्यों के कोर ग्रुप द्वारा नर्मदा नदी के उद्गम स्थल अमरकंटक से सोंडवा (प्रदेश में नर्मदा प्रवाह का अंतिम स्थल) से पुन: अमरकंटक तक की यात्रा के रूप में किया गया है। यात्रा के दौरान नर्मदा तटीय क्षेत्र में चिन्हांकित स्थानों पर संगोष्ठियों, चौपालों एवं अन्यग विविध गतिविधियों का आयोजन हो रहा है, जिसके माध्यम से जन समुदाय को नर्मदा नदी के संरक्षण की आवश्यकता एवं वानस्पतिक आच्छादन, स्वच्छता एवं साफ-सफाई, मृदा एवं जल संरक्षण तथा प्रदूषण की रोकथाम के माध्यम से नर्मदा नदी के संरक्षण के संबंध में जागरूक किया जा रहा है।

नर्मदा अपनी सहायक नदियों सहित प्रदेश के बहुत बड़े क्षेत्र के लिए सिंचाई एवं पेयजल का बारहमासी स्रोत है। नर्मदा नदी का कृषि, पर्यटन, तथा उद्योगों के विकास में महत्वपूर्ण योगदान है, इसके तटीय क्षेत्रों में उगाई जाने वाली मुख्य फसलें धान, गन्ना, दाल, तिलहन, आलू, गेहूं एवं कपास हैं जो प्रदेश की खाद्यान्न व्यवस्था का महत्वपूर्ण स्रोत हैं। इसके तट पर ऐतिहासिक व धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल हैं, जो प्रदेश की आय का महत्वपूर्ण स्रोत हैं। इस प्रकार नर्मदा नदी सामाजिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक, आर्थिक एवं धार्मिक दृष्टि से प्रदेश के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

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नर्मदा के संरक्षण के लिए मध्य प्रदेश सरकार ‘नमामि देवी नर्मदे’ प्रकल्प शुरू किया है। खतरा यह है कि बाकी सरकारी योजनाओं की तरह वह भी केवल फाइलों की शोभा न बन जाए। क्योंकि नदियों की पूजा और परिक्रमा करने के बावजूद आजादी के बाद इनकी हमने घोर उपेक्षा की है। कई नदियां तो गर्मी के दिनों में क्रिकेट खेलने का मैदान बन जाती हैं। नर्मदा पर भी यह खतरा मंडरा रहा है। नर्मदा के उद्गम स्थल अमरकंटक की वादी जंगल तस्करो और बॉक्साइट खदानों के कारण बंजर हो चुकी है। नर्मदा के जल की शुद्धता जांचने के लिए किए गए एक परीक्षण में पता चला है कि अमरकंटक में नर्मदा सबसे ज्यादा मैली है। जाहिर है कि इस हरे-भरे पर्वतीय क्षेत्र को अपने गर्भ में बाक्साइट जैसी कीमती खनिज को छिपाने की कीमत चुकानी पड़ रही है। वहां बाक्साइट खदानों के कारण जल स्तर 300 से 400 फीट तक नीचे चला गया है। नगरपालिकाओं द्वारा गंदे नालों के जरिए दूषित जल नर्मदा में बहाने पर सरकार रोक नहीं लगा पाई है। राज्य के 16 जिले ऐसे हैं जिनके गंदे नालों का प्रदूषित पानी नर्मदा में प्रदूषण के स्तर को बढ़ा रहा है। नर्मदा पर बन रहे बांधों ने इस समस्या को गंभीर बना दिया है।

कई सालों से नर्मदा समग्र संस्था बनाकर नर्मदा के लिए काम करने वाले अनिल दवे अब केंद्रीय पर्यावरण मंत्री है। उनके जैसे जीवटवाले व्यक्ति के काम के बावजूद नर्मदा की यह स्थिति है। दवे कहते है-नर्मदा विश्व की ऐसी अनूठी नदी है जिसकी परिक्रमा की जाती है। ऐसी नदी जिसका पानी ग्लेशियर से नहीं आता। नर्मदा से सबको पानी और ऊर्जा चाहिए। जल तंत्र के बिगडऩे से गंगा और यमुना की दुर्दशा हुई, अगर ध्यान न दिया तो नर्मदा के साथ भी यही होने वाला है। इसलिए इस नदी को संभालने की जरूरत है। जल संसाधन मंत्री उमा भारती भी यही बात कहती हैं। नर्मदा अभी भारत की सबसे साफ नदी है। इस नदी को और निर्मल बनाएंगे। मध्य प्रदेश सरकार भी इस काम में जुट गई है।

सेवायात्रा मुख्य रूप से पदयात्रा होगी, जिसके दौरान स्थानीय जन समुदाय के सहयोग से साइकिल यात्रा भी निकाली जायेगी।

यात्रा मुख्य रूप से नर्मदा नदी के जल एवं मृदा संरक्षण के साथ-साथ स्वच्छता, प्रदूषण की रोकथाम, जैविक कृषि के प्रोत्साहन तथा तटीय क्षेत्रों के संरक्षण पर केन्द्रित रहेगी।

मध्य प्रदेश में नर्मदा नदी 16 जिलों तथा 51 विकासखण्डों से होती हुई 1077 किमी. का मार्ग तय करती है। यात्रा के 118 दिनों के दौरान नर्मदा नदी के तट पर स्थित इन 16 जिलों/51 विकासखण्डों के लगभग 600 ग्रामों/स्थानों को सम्मिलित किया जाएगा। कोर ग्रुप/यात्रा दल द्वारा पूरी यात्रा के दौरान लगभग 3000 किलोमीटर की यात्रा की जायेगी।

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यात्रा के मार्ग (रूट) के अनुसार स्वैच्छिक संगठनों के माध्यम से समस्त चिन्हित स्थानों पर यात्रा के पूर्व यात्रा के संबंध में व्यापक प्रचार-प्रसार किया जा रहा है। यात्रा में विषय विशेषज्ञों एवं जन समुदाय को सहभागी बनाने के लिए वेबसाइट पर उनके पंजीयन की व्यवस्था की गई है। इस यात्रा के प्रचार-प्रसार हेतु सोशल मीडिया का भी उपयोग किया जा रहा है। समस्त चिन्हित ग्रामों में ग्रामवासियों के सहयोग से ग्राम चौपालों/बैठकों का आयोजन किया जायेगा। कोर ग्रुप द्वारा ग्रामीणों को नर्मदा नदी के सामाजिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक, आर्थिक एवं धार्मिक महत्व के विषय में जानकारी दी जा रही है। नर्मदा नदी में प्रदूषण के कारकों/स्त्रोतों तथा जीवन के विविध आयामों से सम्बंधित पर्यावरण संरक्षण की सतत चलने वाली विधियों पर भी चर्चा की जायेगी। ग्रामों में नर्मदा नदी के संरक्षण से संबंधित फिल्में/डाक्यूमेन्ट्री का प्रदर्शन एवं अन्य प्रचार-प्रसार सामग्री का वितरण किया जा रहा है। इस यात्रा में जिस तरह से जन सैलाब उमड़ा है उसने नर्मदा सेवायात्रा को विश्व का सबसे बड़ा नदी संरक्षण अभियान बना दिया है।

 सतीश पेडणेकर

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