डॉ. प्रणव पांडया भारतीय संस्कृति की धरोहर

डॉ. प्रणव पांडया  भारतीय संस्कृति की धरोहर

इस संसार में प्राय: लोग साधारण लक्ष्य और साधारण कार्य करते हुए अपने जीवन को पूरा कर देते हैं। लेकिन इसी भीड़ में कुछ लोग असाधारण ऊर्जा, असाधारण उल्लास, असाधारण आत्मविश्वास और असाधारण तेज से विश्व मानस के आकर्षण के केन्द्र बिन्दु बन जाते हैं। वे अपने चारों ओर एक प्रभाव क्षेत्र का निर्माण कर लेते हैं। ऐसे ही एक बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी एवं भारतीय संस्कृति के प्रतीक पुरुष हैं डॉ. प्रणव पांडया। वे गायत्री परिवार के संचालक हैं, गायत्री परिवार के संस्थापक श्रीराम शर्मा आचार्य के दामाद हैं। इसके अतिरिक्त वे देव संस्कृति विश्वविद्यालय के कुलाधिपति, ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान के निदेशक तथा अखण्ड ज्योति पत्रिका के सम्पादक भी हैं। उन्होंने अपने मौलिक चिंतन एवं अनुसंधान से संसार को चमत्कृत किया है। उनके मन में भारत के प्रति न केवल सात्विक गौरव का भाव है, अपितु इसके चारित्रिक एवं नैतिक उत्थान का दायित्व बोध भी है। उनका व्यक्तित्व देश और काल की सीमा से अप्रतिबद्ध है। उन्होंने न केवल सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक मूल्यों को बल दिया बल्कि सेवा और परोपकार के कार्यों को भी अपने जीवन का अभिन्न अंग बनाया है। लोगों को उन्होंने अपने प्रायोगिक जीवन से नया और जीवंत बोध पाठ दिया है। वे व्यक्ति नहीं, धर्म, दर्शन, कला, साहित्य और संस्कृति के प्रतिनिधि ऋषिपुरुष हैं। उनका संवाद, शैली, साहित्य, साधना, सोच, सपने और संकल्प सभी कुछ मानवीय मूल्यों के योगक्षेम से जुड़े हैं।

डॉ. प्रणव पांडया का जन्म रूप चतुर्दशी, 8 नवम्बर 1950 को हुआ। आपका विवाह वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य  की सुपुत्री शैलबाला पाण्डया के साथ हुआ। आपने एम.जी.एम. मेडिकल कॉलेज, इन्दौर से जनवरी 1972 में एम.बी.बी.एस. उत्तीर्ण किया। इसी संस्था से दिसम्बर 1975 में मेडिसिन में एम.डी. की उपाधि तथा स्वर्ण प्रदक प्राप्त किया। अमेरिका से आकर्षक पद का प्रस्ताव आया, किन्तु भारत में ही रहकर सेवा करना उचित समझा। विद्यार्थी जीवन में न्यूरोलॉजी तथा कार्डियोलॉजी के प्रख्यात विशेषज्ञों से जुड़कर मार्गदर्शन प्राप्त किया।

डॉ. पांडया युग निर्माण योजना मिशन से 1963 में सम्पर्क में आये। सन् 1969 से 1977 के बीच गायत्री तपोभूमि मथुरा तथा शांतिकुंज हरिद्वार में लगे कई शिविरों में भाग लिया। सितम्बर 1978 में नौकरी से त्याग पत्र देकर स्थायी रूप से हरिद्वार आ गये। पंडित श्रीराम शर्मा के शिष्य और आध्यात्मिक क्षेत्र के पुरोधा पांडया की दुनियाभर में वैज्ञानिक आध्यात्मिकता के लिए अपनी एक अलग ही पहचान है तथा उनके नेतृत्व में दुनिया के करीब 80 देशों में गायत्री परिवार की शाखाएं संचालित हैं। साथ ही भारत में भी एक बड़ा जन समुदाय उनका अनुयायी है। पं. श्रीराम शर्मा के मार्गदर्शन एवं संरक्षण में अध्यात्म और विज्ञान के समन्वय हेतु अनेक प्रभावी एवं चमत्कारी प्रयोग किए हैं। अभी तक शांतिकुंज में अस्सी हजार से अधिक साधकों पर यह प्रयोग-परीक्षण किये जा चुके हैं। संस्थान सभी आवश्यक विषयों पर पचास हजार से अधिक पुस्तकों के पुस्तकालय से सुसज्जित है।

डॉ. पांडया को अनेक पुरस्कार एवं सम्मान मिल चुके हैं- जिनमें ज्ञान भारती सम्मान 1998, हिन्दू ऑफ दि ईयर पुरस्कार 1999, अमेरिका की विश्वविख्यात अंतरिक्ष इकाई ‘नासा’ द्वारा वैज्ञानिक अध्यात्मवाद के प्रचार-प्रसार हेतु संस्तुति एवं विशेष सम्मान एवं हनुमान प्रसाद पोद्दार राष्ट्र सेवा सम्मान 2000 प्रमुख हैं। उन्होंने राज्यसभा के प्रस्ताव को ठुकराते हुए कहा कि मुझे नहीं लगता कि राज्यसभा में माहौल मेरे अनुकूल है। मैं राज्यसभा के बाहर रहकर करोड़ों लोगों की जिंदगी की बेहतरी के लिए काम करना ज्यादा पसंद करूंगा।

श्री पांडया लोगों के आध्यात्मिक एवं नैतिक उत्थान के साथ-साथ नशामुक्ति, नारी उत्थान, पर्यावरण, प्रकृति एवं जनजीवन को उन्नत जीवन जीने की कला सिखाने के लिए निरंतर प्रयासरत है। निर्मल गंगा जन अभियान के अंर्तगत उन्होंने गायत्री परिवार के हजारों कार्यकर्ताओं के सहयोग से गंगोत्री से गंगासागर तक गंगा किनारे बने 200 घाटों पर एक साथ सफाई अभियान चलाया। गायत्री परिवार अपने दीर्घकालीन योजना के तहत गंगोत्री से गंगासागर तक गंगा नदी की सफाई का कार्य कर रहा है। मां गंगा को प्रदूषण मुक्त करने का उनका संकल्प कोरा दिखावा नहीं बल्कि एक अभिनव उपक्रम है।

श्री पांडया वृक्षारोपण के लिए भी उल्लेखनीय उपक्रम कर रहे हैं। लोगों की सांसों को शुद्ध वायु प्रदान करने के लिये गायत्री परिवार इस समय वृक्ष गंगा अभियान चला रहा है। एक करोड़ पौधे लगाकर पूरे देश में गायत्री परिवार के संस्थापक श्री राम शर्मा आचार्य की जन्म शताब्दी मनाने का विशिष्ट उपक्रम किया गया। इस अभियान के लिये खासतौर से हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, बिहार और झारखंड जैसे उन राज्यों को चुना गया, जहां वृक्षावरण 15 फीसदी से भी कम है। मध्य प्रदेश के बुरहानपुर में 1008 और बडवानी में 501 त्रिवेणी उपवन स्थापित किये गये हैं। साथ ही इन पौधों की देखभाल करने के लिये तरु मित्र और तरु पुत्र भी बनाये गये हैं जो पौधों के बड़ा होने तक यह जिम्मेदारी निभायेंगे। शांतिकुंज आश्रम में विभिन्न संस्कार संपन्न कराने पर तरु प्रसाद के रूप में पौधे ही दिये जाते हैं। अब तक पांच लाख पौधे तरु प्रसाद के रूप में दिये जा चुके हैं। पंचवटी और त्रिवेणी उपवन बनाकर अब तक विभिन्न राज्यों में 35 लाख से अधिक पौधे लगाये जा चुके हैं। उत्तर प्रदेश के नैमिषारण्य क्षेत्र में 88 हजार ऋषियों की स्मृति में एक साथ 88 हजार पौधे लगाये गये हैं।

डॉ. पांडया का संपूर्ण जीवन तेजस्विता का सफरनामा है। तेजस्वी व्यक्तित्व का यह प्रगतिशील सफर सीख देता है कि संकल्प जब भी करो, पूरी प्राणवत्ता के साथ करो। कोई विकल्प शेष न रह जाए। आज संकल्प किया और कल परिस्थितियां बदल गई तो संकल्प भी बहाना ढूंढने लग जाए, यह क्षाम्य नहीं, संकल्प फौलादी चट्टान-सा मजबूत हो। हमारा संकल्प सृजनशील संकल्प हो। न उसमें विचारों का आग्रह हो, न परम्पराओं का व्यामोह, न सिद्धांतों की कट्टरता हो, न क्रिया में जड़ता हो। समय का हर पल पुरुषार्थ के साथ निर्माण का नया इतिहास रचे। सफलता स्वयं उपलब्धि बने। उनकी इसी उदारवादी सोच ने सामयिक संदर्भों से जुड़कर युग की समस्याओं को समाहित करने का प्रयत्न इतिहास की दुर्लभ घटना है।

अखिल भारतीय गायत्री परिवार के प्रमुख एवं धर्म नेता होते हुए भी उनके विचार और कार्यक्रमों में केवल धर्म की व्याख्या ही नहीं होती बल्कि विज्ञान का समावेश भी उसमें होता है। व्यवहार में दोनों की दिशाएं भिन्न-भिन्न हैं, उनकी पैनी दृष्टि दोनों के बीच पूरकता को देखा ही नहीं, उसे समझने का प्रयत्न भी किया है। उनकी दृष्टि में कोरा विज्ञान विध्वंसक तथा कोरा अध्यात्म रूढ़ है। अत: आध्यात्मिक वैज्ञानिक व्यक्तित्व की कल्पना ही नहीं की उसे प्रयोग की धरती पर उतारकर इतिहास में एक नये अध्याय का सृजन भी किया है।

डॉ. पांडया सत्यं शिवं सुंदरम के प्रतीक हैं। यही कारण है कि उनके विचारों और कार्यक्रमों में केवल सत्य का उद्घाटन या सौंदर्य की सृष्टि ही नहीं हुई है अपितु शिवत्व का अवतरण भी उनमें सहजतया हो गया है। उनकी सार्वभौमिकता का सबसे बड़ा कारण है कि वे गहरे विचारक होते हुए भी किसी विचार से बंधे हुए नहीं है। उनका आग्रहमुक्त एवं निद्र्वंद्व मानस कहीं से भी अच्छाई और प्रेरणा ग्रहण कर लेता है। उनकी प्रत्युत्पन्न मेघा हर सामान्य प्रसंग को भी पैनी दृष्टि से पकडऩे में सक्षम है। उनके आस-पास क्रांति के स्फुलिंग उछलते रहते हैं। उनकी क्रांतिकारिता इस अर्थ में अधिक सार्थक है कि वे अपनी बात को निर्भीक रूप से कहते हैं। बुराई या पूर्वाग्रह के प्रति कभी-कभी वे बहुत प्रचण्ड एवं तीखी आलोचना से भी नहीं चूकते। वे इस बात से भी भयभीत नहीं होते कि उनकी बात सुनकर कोई नाराज हो जाएगा। राज्यसभा की सदस्यता को ठुकराने का प्रसंग और ऐसे ही अनेकों अवसरों पर हमने उनकी निर्भीकता, वेधकता एवं साहसिकता को देखा है।

प्रणव पुरुषार्थ की एक जलती मशाल हैं। उनके व्यक्तित्व को एक शब्द में बंद करना चाहें तो वह है पौरुष। चरैवेति-चरैवेति का आर्षवाक्य उनके कण-कण में रमा हुआ है। अत: अकर्मण्यता और सुविधावाद पर जितना प्रहार उन्होंने किया है, उतना अन्यत्र दुर्लभ है। उनके जीवन की सबसे बड़ी विशेषता है सरलता और सादगी। वे गृहस्थ होते हुए भी सच्चे संत की तरह रहते हैं। भारत की जीनियस- प्रतिभा के सच्चे प्रतिनिधि न वैज्ञानिक हैं और न ही आध्यात्मिक हैं अपितु आध्यात्मिक-वैज्ञानिक-व्यक्तित्व हैं और प्रणव पांडया इसके जीवंत उदाहरण हैं।

 ललित गर्ग

Leave a Reply

Your email address will not be published.