अनेक रोगों में कारगर स्वदेशी वनौषधि ‘श्वेत मूसली’

अनेक रोगों में कारगर स्वदेशी वनौषधि ‘श्वेत मूसली’

श्वेत मसनली की खेती मूलत: उष्णकटिबंधीय यूरोप एवं पश्चिमी एशिया में तथा भारत में पश्चिम हिमालय, पंजाब, उत्तराखण्ड में 1600मी. की उंचाई तक तथा गुजरात, उत्तर प्रदेश एवं भारत में सामान्य रूप से की जाती है। सफेद मूसली के लिये दो तरह के पौधों का प्रयोग किया जाता है जो कि गुणों में लगभग समान होते हैं। इनमें प्रथम  Asparagus adscendens Roxb. व दूसरा chlorophytum borivilianum Santapau & Fernandes नाम से जाना जाता है।

Asparagus adscendens Roxb: 

सीधा, बहुशाखित, पर्णपाती, बहुवर्षायु, शाकीय पौधा होता है। इसका काण्ड लम्बा, मोटा, गोल, लगभग सीधा, अरोमिल तथा शाखाएं झुकी हुई, आरोहणशील, धूसर वर्ण की नालीदार एवं कांटे-12-18 मिमी लम्बे, सीधे मोटे होते हैं। इसके पत्र पतले नुकीले शतावर के पत्र पतले नुकीले शतावर के पत्र जैसे तथा चमकीले हरित वर्ण के होते हैं। इसकी मूल मूलस्तम्भ से उत्पन्न, रोमश, श्वेत, लम्बी, सफेद रंग की, झुर्रीदार, आसानी से टुटने वाली तथा 6 मिमि मोटी होती है, जो जल में डालने से फूल जाती है। इसका पुष्पकाल अक्टूबर से फरवरी तक होता है।

Chlorophytum borovilianum santapau & Fernandes:

भारत के पहाड़ी क्षेत्रों में पाया जाता है। यह कंदीय मूल वाला, एकवर्षायु अथवा द्विवर्षायु शाकीय पौधा होता है। इसके पत्र सरल, मूलांकुर, रेखीय भालाकार अथवा अधोमुख अण्डाकार एकान्तर होते हैं। इसके पुष्प श्वेतवर्ण के होते हैं। इसकी मूल सफेद रेग की, लम्बी, 5-7 के गुच्छों में चिपचिपी तथा मधुर रसयुक्त होती है। बाजार में सफेद मूसली के नाम से इसकी जड़े बेजी जाती हैं। इसका पुष्पकाल एवं फलकाल नवम्बर से अप्रैल तक होता है।

रासायनिक संघटन:

इसके पौधे में सैपोनिन, डायोसजेनिन, एसपेरिनन, एडस्केन्डिन, एस्केन्डोसाईड़, जाईलोज, रेम्नोस, ग्लूकोस, पॉमिटिक अम्ल, स्टियरिक अम्ल तथा यूरोनिक अम्ल पाया जाता है।

औषधीय प्रयोग एवं विधि:

वक्ष रोग:

  • स्तन्यवर्धनार्थ- 2-4 ग्राम मसूली चूर्ण में समभाग मिश्री मिलाकर दूध के साथ सेवन करने से स्तन्य की वृद्धि होती है।

उदर रोग:

  • प्रवाहिका- 2-4 ग्राम मूशली मूल चूर्ण को दुग्ध के साथ मिलाकर प्रयोग करने से अतिसार, प्रवाहिका तथा अजीर्ण में लाभ होता है।
  • उदर विकार- 1-2 ग्राम मूसली कंद चूर्ण का सेवन करने से अतिसार, उदावर्त, उदरशूल तथा अरूचि का शमन होता है।

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वृक्कवस्ति रोग:

  • मूत्रकृच्छ्र- 1-2 ग्राम मूसली मूल चूर्ण का सेवन करने से मूत्रकृच्छ्र का शमन होता है।

प्रजननसंस्थान संबंधी रोग:

(1-2 ग्राम) मूल चूर्ण में समभाग मिश्री मिलाकर सेवन करने से सामान्य दौर्बल्य तथ शुक्र दौर्बल्य का शमन होता है।

  • पूयमेह (सूजाक)- 1-2 ग्राम मूल चूर्ण का सेवन करने से पूयमेह (सूजाक) में लाभ होता है।
  • प्रदर- 1-2 ग्राम कंद चूर्ण का सेवन करने से श्वेत प्रदर में लाभ होता है।
  • दौर्बल्य- 2-4 ग्राम कंद चूर्ण में मिश्री मिलाकर दुग्ध के साथ सेवन करने से हर प्रकार के दौर्बल्य लैंगिक दौर्बल्य का समन होता है।
  • वीर्य वर्धनार्थ- 2-4 ग्राम मूसली चूर्ण में समाभाग शर्करा मिलाकर गोदुग्ध के साथ सेवन करने से वीर्य की वृद्धि होती है तथा मूत्रकृच्छ, मूत्रदाह आदि मूत्र विकारों में लाभ होता है।

 

आयुर्वेदिक गुण:

1 Asparagus adscendens Roxb.:

  • इस प्रजाती की सफेद मूसली मधुर, उष्ण, गुरू, वातसामक, वृष्य, बृहंण तथा रसायन होती है।
  • यह पित, जलन, श्रम तथा गुदारोग शामक होती है।
  • इसके पत्र कफनिस्सारक होते हैं।
  • इसका काण्ड वालीकारक होता है।
  • इसकी मूल प्रशामक, रक्ताल्पारोधी, बलकारक, शीतल तथा स्तन्यजनन होती है।
  • इसकें कंदीय मूल में एक स्टेराईडयुक्त सैपोनिन पाया जाता है जो परखनलीय पराक्षण में विविध रोगकारक सूक्ष्मजीवियों की वृद्धि का निरोध करता है।
  • यह इप्सुलिन वर्धक क्रियाशीलता एवं स्टार्च के पाचन पर निरोधक प्रभाव प्रदर्शित करता है।
  • इसके मूल का जलीय एवं एल्कोहॉलिक सार परखनलीय परीक्षण में सेटेरिया सेर्वि के प्रति फाइलेरियारोधी क्रियाशीलता प्रदर्शित करता है।

Chlorophytum borovilianum santapau & Fernandes.:

  • प्रजाति का कंद मधुर, स्तंभक, कामोत्तेजक, मृदुकारी, स्तन्यजनन, कफनि:सारक, शीतल, मूत्रल तथा बलकारक होता है।
  • यह मेदोरोग, अर्श, श्वास, रक्ताल्पता, श्वासनलिकाप्रदाह, हृद्विकारक तथा मधुमेह में हितकर होता है।
  • यह परखनली परिक्षण में तनावरोधी क्रियाशीलता प्रदर्शित करता है।
  • यह वेदनाशामक गुण प्रदर्शित करती है।
  • इसका मूल सार शोथहर क्रिंयाशिलता प्रदर्शित करता है।
  • यह व्यधिक्षमत्ववर्धक क्रियाशीलता प्रदर्शित करती है।

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अस्थिसंधि रोग:

  • आमवत- मूसली कंद को पीसकर लगाने से तथा कंद चूर्ण का सेवन करने से आमवात में लाभ होता है।

रसायन वाजीकरण:

वाजीकरण- समभाग सफेद मूसली, गुडूची सत्त्, कौंमच बीज, गोखरू, सेमलकंद, आंवला तथा शर्करा से निर्मित चूर्ण को, 2-4 ग्राम की मात्रा में लेकर घी तथा दूध में मिलाकर पीने से वाजीकरण गुणों की वृद्धि होती है।

(साभार: योग संदेश)

आचार्य बालकृष्ण

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