अभी राजनीति की क्रिकेट टीम ढूढ़ते नवजोत सिद्धू

अभी राजनीति की क्रिकेट टीम ढूढ़ते नवजोत सिद्धू

राजनीति के खेल में धमाका करने से पूर्व नवजोत सिंह सिद्धू ने भारतीय क्रिकेट टीम में एक सधे हुये ओपनर के रूप में अपना नाम कमाया था। जब उन्होंने राजनीति की क्रिकेट में पदार्पण किया तो उसमें भी छक्के ही मारे। राजनीति में भी अपने पहले ही मैच में उन्होंने अमृतसर लोकसभा सीट से भाजपा उम्मीदवार के रूप में जीत के झण्डे गाड़ दिये। इसी चुनाव क्षेत्र से लगातार तीसरी बार जीत कर उन्होंने हैट्रिक भी बना डाली। जल्द ही उन्होंने पार्टी के स्टार प्रचारक के रूप में अपना स्थान बना लिया।

पर यह तीसरी पारी उनके लिये इतनी सुखदाई व सन्तोषजनक नहीं रही। इसमें उतार-चढ़ाव के बहुत झटके आये। इसी बीच सिद्धू को इलैक्ट्रानिक चैनलों में भाग लेने का अवसर मिल गया। इससे उन्हें राजनीति और क्रिकेट के बाद छोटे पर्दे पर हास्य कार्यक्रमों में पहचान मिल गई। इससे उनको आर्थिक लाभ भी मिला। अपने चुनाव क्षेत्र में उनके आने-जाने पर असर पड़ा। बात तो यहां तक पहुंच गई कि उनके विरोधियों ने उनके गुमशुदा के पोस्टर चिपका दिये। जब जनता ने अपने क्षेत्र में काम न होने का आरोप लगाया तो उन्होंने इस दोष का ठीकरा अकाली सरकार पर फोड़ दिया। यह उनके और अकाली दल के बीच झगड़े की चिनगारी थी जो बढते-बढ़ते धधकती आग में बदल गई और कभी शान्त न हो सकी। बात तो यहां तक बिगड़ गई कि वह सब से पुराने अकाली-भाजपा गठबन्धन को तोडऩे की ही बात करने लगे। कईयों का तो मत है कि वह उस हालत में अपने आपको भाजपा के मुख्यमन्त्री  पद का उम्मीदवार देखने लगे। पर पार्टी अपने उस साथी दल से नाता तोडऩे के हक में नहीं लगती थी जो उसके साथ हर अच्छे व बुरे दिन में कन्धे से कन्धा मिलाकर खड़ी रही थी। इस कारण सिद्धू अपनी पार्टी से भी उखड़े-उखड़े रहने लगे।

वैसे पार्टी ने प्रसन्न रखने के लिये उन्हें कई पद दिये। पर हालात तब बदतर हो गये जब पार्टी ने 2014 के लोकसभा चुनाव में सिद्धू के स्थान पर अपना प्रत्याशी अरूण जेटली को बना दिया। सिद्धू जेटली को अपना गुरू मानते हैं और उनका बड़ा सम्मान करते हैं। पर पार्टी का यह निर्णय वह पचा न पाये। उन्होंने जेटली के लिये प्रचार भी नहीं किया। जेटली हार गये। जेटली को सिद्धू और अकाली सरकार दोनों की एंटीइनकमबैंसी की मार सहनी पड़ी। यह धारणा गलत लगती है कि यदि सिद्धू प्रत्याशी होते तो वह जीत जाते। उनके अकाली दल के साथ रिश्ते इतने बिगड़ चुके थे कि अपनी एंटीइनकमबैंसी की मार तो उन्हें पड़ती ही पड़ती, अकाली भी पूरी जान लड़ा देते कि वह न जीतें।

फरवरी 2016 में भाजपा ने सिद्धू को राज्यसभा का सांसद मनोनीत कर दिया और उन्होंने शपथ भी ग्रहण कर ली। पर लगभग पांच मास बाद जुलाई में राज्यसभा से अचानक त्याग पत्र दे कर उन्होंने सब को चकित कर दिया। हालांकि चर्चाओं का बाजार गर्म रहा कि वे भाजपा भी छोड़ देंगे पर लगभग दो मास वह चुप ही रहे। प्राप्त रिपोर्टों के अनुसार भाजपा ने भी उन्हें मनाने की कोई कोशिश  नहीं की। एक बार वह मीडिया के सामने अवश्य आये और अपनी पीड़ा व्यक्त  की पर यह स्पष्ट नहीं किया कि वह पार्टी छोड़ रहे हैं। उन्होंने यह जोर देकर कहा कि आप सिद्धू को वहां खड़ा पायेंगे जहां पंजाब का हित होगा। उनकी धर्मपत्नी ने अवश्य घोषणा की कि सिद्धू भाजपा छोड़ देंगे। उन्होंने देर तो की पर अन्तत: भाजपा छोड़ दी। उनकी पत्नी ने तो यह घोषणा भी कर दी कि वह आम आदमी पार्टी में शामिल हो जायेंगे। सिद्धू ने दिल्ली के मुख्य मन्त्री व ‘आप’ प्रमुख अरविन्द केजरीवाल से मुलाकात भी की। पर लगता है बात सिर न चढ़ सकी। केजरीवाल ने सिद्धू को उप-मुख्यमंत्री बनाने की पेशकश नहीं की और यह भी कह दिया कि उनकी पार्टी के नियमों के अनुसार वह उनको और उनकी पत्नी दोनों को चुनाव नहीं लड़ा सकते। बात वहीं खत्म हो गई।

सिद्धू की राजनीति अब एक चौराहे पर खड़ी हो गई। अन्तत: उन्होंने अकाली असन्तुष्ट विधायक व पूर्व भारतीय हॅाकी टीम कप्तान परगट सिंह व अन्य दो बैंस भाइयों के साथ आवाजे पंजाब दल का गठन कर दिया। यह भी कह दिया गया कि उनका संगठन पंजाब की सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़ा करे। इससे पहले कि इस संगठन की विधिवत संरचना हो सकती उनके साथी उन्हे छोड़ कर चलते बने। बेचारे सिद्धू रह गये अकेले।

अब सिद्धू के पास राजनीति में अपना वजूद कायम रखने के लिये कांग्रेस की शरण में जाने के सिवाय और कोई चारा न रह गया। उधर प्रदेश कंग्रेस अध्यक्ष कैप्टन अमरिन्दर सिंह ने भी कांग्रेस में सिद्धू की डीएनए तलाश ली। उन्होंने सिद्धू को कांग्रेस में आने का खुला आमन्त्रण दे दिया। उन्होंने कहा कि सिद्धू के पिता तो कांग्रेसी थे और दो बार कांग्रेस टिकट पर विधानसभा चुनाव भी लड़ चुके थे हालांकि वह दोनों बार ही विजयी न रह सके। पर सिद्धू चुप रहे। अब उनकी पत्नी ने कैप्टन की मौजूदगी में कांग्रेस का दामन थाम लिया है और ऐलान कर दिया है कि सिद्धू भी शीघ्र ही ऐसा करेंगे।

राजनीति में तो लगता है सिद्धू अपनी वामांगनी का परछाईं की तरह पीछा कर रहे हैं। सिद्धू प्राय: खामोश ही रहते हैं। जनता और मीडिया से बात तो उनकी धर्मपत्नी ही करती हैं।

इसी बीच सिद्धू ने कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी से भी मुलाकात कर ली और लगता है कि पंजाब के हित अपने साथ लेकर कांग्रेस में आने के लिये तैयार हो गये हैं पर अभी तब न वह पार्टी में शामिल हुये हैं और न इसकी घोषणा की है। वह क्या प्रतीक्षा कर रहे हैं, यह तो वह ही जानें।

कांग्रेस में भी उनकी डगर इतनी आसान नहीं दिखती। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार सिद्धू को उप-मुख्यमंत्री पद देने का आश्वासन दिया गया है। यह इतना आसान नहीं लगता। कैप्टन और सिद्धू दोनों ही मूलत: पटियाला से हैं और जाट जाति से संबंधित। एक ही क्षेत्र व एक ही जाति के मुख्यमन्त्री व उप-मुख्यमंत्री जनता को कितना लुभायेंगे यह कहना मुश्किल है। यह मान लेना भी बहुत अधिक ठीक नहीं लगता कि जनता सिद्धू की जेब में है और उसी ओर लुढ़क जायेगी जिधर सिद्धू जायेंगे।

यह तथ्य भी नहीं भूलना चाहिये कि 2012 के विधानसभा चुनाव में भी सिद्धू ने प्रचार नहीं किया था क्योंकि वह अकाली दल से नाराज चल रहे थे। इसके बावजूद भी भाजपा-अकाली सरकार दोबारा सत्ता में आ गई थी।

सिद्धू चाहे कितने भी जोर से कहते फिरें कि उनकी लड़ाई पंजाब के हितों की है और वह वहीं खड़े मिलेंगे जहां पंजाब का हित होगा। यदि यही बात होती तो वह ‘आप’ और कांग्रेस से अलग-अलग सौदेबाजी क्यों करते? फिर पिछले लगभग 15-20 वर्ष से वह उस गठबंधन के साथ क्यों कर रहे थे जहां उन्हें  पंजाब के हित सुरक्षित नहीं लग रहे थे? यह भी नहीं भूला जा सकता कि भाजपा ने सिद्धू को बनाया, सिद्धू ने भाजपा को नहीं। भाजपा ने उन्हे तीन बार लोकसभा सदस्य बनने का मौका दिया। उन्हें राष्ट्रीय मंत्री व स्टार प्रचारक बनाया। हाल ही में उन्हें राज्यसभा सदस्य बनाया। उनकी पत्नी को विधायक व मुख्य संसदीय सचिव बनाया। क्या पंजाब की जनता यह मानने के लिये तैयार है कि यह सब सिद्धू के साथ व पंजाब के साथ घोर अन्याय का प्रमाण है? क्या पंजाब की जनता की याददाश्त इतनी कमजोर मान ली जाये कि वह भूल चुकी होगी कि सिद्धू पिछले दो दशक में कांग्रेस और पिछले तीन साल में ‘आप’ व केजरीवाल के विरूद्ध क्या-क्या जुमले छोड़ते फिरते थे?

सिद्धू और उनकी पत्नी यदि किसी अमृतसर की विधानसभा सीट से चुनाव लड़ते हैं तो उनका जीत जाना पत्थर पर लकीर समझ बैठना गलत होगा। उन्हें एंटी-इनकमबैंसी से भी जूझना पड़ेगा। उनके विरूद्ध एंटी-इनकमबैंसी का कीचड़ मात्र दल-बदल के नाटक से इतनी आसानी से नहीं धुल सकेगा। जनता जानती है कि चार साल तो सत्ता का भोग कर लिया और अब पार्टी से छोड़ वह शहीद बनना चाहते हैं।

इस सम्भावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि भाजपा-अकाली गठबंधन के लिये अपने प्रत्याशी की विजय से भी अधिक प्रतिष्ठा का प्रश्न होगा सिद्धू व श्रीमती सिद्धू को हराना।

फिलहाल तो सिद्धू को राजनीति की क्रिकेट की कोई टीम ही नहीं मिल रही है जिसमें वह किसी स्थान पर खेल सकें। फिलहाल तो यह भी देखना है कि वह स्वयं खेल भी पायेंगे या स्टार प्रचारक के रूप में रनिंग कमैंट्री ही करेंगे।

अम्बा चरण वशिष्ठ

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